सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से चल रहे भूमि विवाद पर मंगलवार को अहम सुनवाई हुई। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें एक निजी कंपनी को सैकड़ों एकड़ जमीन अपने पास रखने की अनुमति दी गई थी। मामला करीब पांच दशक पुराने भूमि-वेस्टिंग आदेश से जुड़ा है, जिसे राज्य सरकार ने कभी अंतिम मान लिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद State of West Bengal बनाम Jai Hind Pvt. Ltd. से जुड़ा है। जय हिंद प्राइवेट लिमिटेड ने दावा किया था कि वह 1 जनवरी 1952 से पहले और उसके बाद खरीदी गई जमीन पर खेती कर रही थी और इसलिए उसे West Bengal Estates Acquisition Act, 1953 के तहत जमीन रखने का अधिकार है।
1971 में, संबंधित राजस्व अधिकारी ने कंपनी का यह दावा खारिज कर दिया था। अधिकारी ने कहा था कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि वह केवल कृषि कार्य में ही लगी हुई थी। इसके बाद, कंपनी की जमीन राज्य में निहित (vest) कर दी गई।
कंपनी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन वह याचिका बाद में खारिज हो गई और कई सालों तक मामला वहीं ठहरा रहा।
वर्षों बाद आदेश की समीक्षा
करीब 37 साल बाद, 2008 में राज्य सरकार के निर्देश पर एक ब्लॉक लैंड एंड लैंड रिफॉर्म्स ऑफिसर ने 1971 के आदेश की समीक्षा (review) की। इस समीक्षा में पुराने फैसले को पलटते हुए कंपनी को लगभग 211 एकड़ जमीन रखने की अनुमति दे दी गई।
इसी समीक्षा आदेश के आधार पर हाईकोर्ट ने 2012 में कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया और राज्य सरकार को जमीन का लगान स्वीकार करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने साफ कहा कि
“किसी भी अर्ध-न्यायिक अधिकारी के पास अपने पुराने और अंतिम हो चुके आदेश की समीक्षा करने की शक्ति तभी हो सकती है, जब कानून में इसकी स्पष्ट अनुमति हो।”
अदालत ने यह भी कहा कि राजस्व अधिकारी को ऐसा कोई अधिकार कानून ने नहीं दिया था। इसलिए 2008 में किया गया रिव्यू कानूनन गलत था।
न्यायालय का स्पष्ट रुख
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 1971 का आदेश पहले ही अंतिम हो चुका था। कंपनी की याचिकाएं समय पर खारिज हो चुकी थीं और कई वर्षों तक उस आदेश को चुनौती नहीं दी गई।
पीठ ने कहा,
“कार्यपालिका के अधिकारी अपने ही फैसलों पर दोबारा बैठकर उन्हें पलट नहीं सकते। ऐसा करना न्यायिक व्यवस्था और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है।”
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 2012 के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही, 2008 में पारित समीक्षा आदेश को भी अवैध घोषित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि 1971 का मूल भूमि-वेस्टिंग आदेश ही मान्य रहेगा और कंपनी को उस जमीन पर कोई अधिकार नहीं मिलेगा।
इसी के साथ, राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली गई और मामला यहीं समाप्त हुआ।
Case Title: State of West Bengal & Ors. vs Jai Hind Pvt. Ltd.
Case No.: Civil Appeal No. 7407 of 2012
Decision Date: 06 February 2026

