हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में आयोजित एक साहित्यिक चर्चा कार्यक्रम के दौरान कथाकार मनोज रुपड़ा के साथ जो दुर्व्यवहार देखने को मिला, वह केवल एक व्यक्तिगत अपमान नहीं बल्कि साहित्यिक संस्कृति और आयोजन के मूल आदर्शों पर एक गंभीर चोट है। यह कार्यक्रम साहित्य अकादेमी और गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के सहयोग से आयोजित किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य समकालीन हिंदी कहानी और बदलते जीवन संदर्भ पर विमर्श करना था।
मनोज रुपड़ा, जो भारतीय साहित्य जगत में अपनी पहचान और सम्मान रख चुके हैं, आयोजन में मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित थे। मंच पर कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ और विश्वविद्यालय के कुलपति ने हल्के अंदाज़ में अपनी बात शुरू की। लेकिन जैसे ही रुपड़ा ने विषय से हटकर कहे गए चुटकुलों और बयानों पर शांतिपूर्ण प्रतिक्रिया दी, तब कुलपति का रवैया अचानक कठोर हो गया। उन्हें सार्वजनिक रूप से बाहर जाने को कहा गया, जिससे रूपड़ा को कार्यक्रम छोड़कर बाहर निकलना पड़ा।
यह याद रखना आवश्यक है कि साहित्यिक आयोजन शब्द, विचार और चर्चा के आदान-प्रदान के लिए होते हैं। ऐसे मंचों पर विविध दृष्टिकोणों को सम्मान देना ही इन आयोजनों का शाश्वत मूल्य है। लेकिन इस घटना में आयोजक द्वारा स्थापित व्यापक मंच पर एक सम्मानित लेखक के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उससे यह प्रश्न उठता है कि क्या हम वास्तव में साहित्य के मुख्य उद्देश्य — संवाद, आदर और बौद्धिक स्वतंत्रता — को समझते हैं?
कुलपति का यह तानाशाही रवैया न केवल रुपड़ा के व्यक्तिगत अनुभव को अपमानित करता है, बल्कि यह दर्शाता है कि आज के शैक्षणिक-सांस्कृतिक मंचों पर भी सत्ता और पद की शक्ति का प्रभाव कितना गहरा है। एक लेखक को मंच से हटाना या उसकी अभिव्यक्ति पर आपत्ति जताना, साहित्यिक विमर्श का अपमान है — वह भी ऐसे आयोजन में, जिसे प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी ने संरचित किया हो।
साहित्य अकादेमी का इतिहास और उद्देश्य यह रहा है कि वह भाषा, साहित्य और विचार के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करे। अकादेमी के कार्यक्रमों में ‘Meet the Author’ जैसे सेगमेंट होते रहे हैं, जहां लेखकों को अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिलता है और अन्य साहित्यकारों से विमर्श का अवसर भी मिलता है।
लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या आयोजन के सफल होने के लिए केवल नाम, प्रतिष्ठा या आयोजन स्थल का चयन काफी है? यदि मंच पर बैठे व्यक्तियों का व्यवहार ही सम्मानजनक और विचार-प्रधान नहीं होगा, तो आयोजन की सार्थकता कुछ भी रह नहीं जाती। साहित्य सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं है; यह उन शब्दों का सम्मान है जो समाज के बदलते संदर्भों को प्रतिबिंबित करते हैं। यह सम्मान तभी जीवित रह सकता है जब लेखक और विचारक स्वतंत्र और सुरक्षित रूप से चर्चा कर सकें।
दुर्भाग्य से, इस घटना ने यह भी उजागर किया है कि साहित्यिक आयोजन आज भी शक्ति संतुलन, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत भावना-विरोध के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर पाए हैं। यदि आयोजन पक्ष की भावना ही अतिथि लेखक के विचारों से अलग हो, तो वहाँ संवाद की संभावनाएँ अपने आप सीमित हो जाती हैं।
इस घटना के विरोध में कई साहित्यिक और सांस्कृतिक समूहों ने अपनी चिंता व्यक्त की है और मांग की है कि ऐसे व्यवहार के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। वे यह भी मांग कर रहे हैं कि संस्कृति और साहित्य के मंचों पर सम्मान और सभ्यता का स्तर बरकरार रखा जाए।
साहित्य केवल शब्दों और कहानियों का संग्रह नहीं है; वह मानवीय संवेदना, विचारों की अभिव्यक्ति और विभिन्न दृष्टिकोणों का सम्मान भी है। जब कोई मंच इन मूल्यों को ठुकराता है तो वह केवल एक कार्यक्रम नहीं खो देता, बल्कि अपनी प्रतिष्ठा खोने की दहलीज पर खड़ा हो जाता है।
आखिरकार, साहित्य किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि समाज के साझा अनुभवों और बौद्धिक विमर्श का धरोहर है। ऐसे में यह आवश्यक है कि आयोजक, लेखक और सहभागी सभी मिलकर यह सुनिश्चित करें कि साहित्य मंचों पर केवल विचारों का सम्मान नहीं हो, बल्कि हर बोलने वाले की गरिमा बनी रहे।

