आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे और आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल पशु अधिकार बनाम मानव सुरक्षा का सवाल नहीं, बल्कि नीति, प्रशासन और संवैधानिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा विषय है।
अदालत में दाखिल अन्य आवेदकों की ओर से यह दलील दी गई कि आवारा कुत्तों को पूरी तरह हटाना या समाप्त करना किसी भी तरह से स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इन आवेदकों में जानी-मानी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर भी शामिल हैं, जिन्होंने पशु कल्याण के दृष्टिकोण से हस्तक्षेप याचिका दाखिल की है।
आवेदकों की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि आक्रामक व्यवहार दिखाने वाले कुत्तों की व्यवहारिक जांच (Behavioral Assessment) की जा सकती है। इसके साथ ही माइक्रोचिपिंग के माध्यम से उनकी पहचान, निगरानी और जिम्मेदारी तय की जा सकती है, जिससे समस्या को वैज्ञानिक और मानवीय ढंग से संभाला जा सके।
दलील दी गई कि सभी कुत्तों को एक ही श्रेणी में रखकर देखना अनुचित होगा। वकील ने कहा कि जो कुत्ते आक्रामक हैं, उन्हें अलग कर उपचार और प्रशिक्षण दिया जा सकता है, और स्थिति सामान्य होने पर उन्हें समाज में दोबारा शामिल किया जा सकता है। इससे न केवल पशुओं के अधिकार सुरक्षित रहेंगे, बल्कि आम जनता की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।
हालांकि, इस तर्क पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने विदेशी मॉडलों की तुलना पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विकसित देशों के उदाहरणों को भारतीय परिस्थितियों पर यथावत लागू करना व्यावहारिक नहीं है।
न्यायमूर्ति मेहता ने टिप्पणी करते हुए कहा,“उन देशों की जनसंख्या क्या है? उनकी सड़कों, बस्तियों और प्रशासनिक संरचना की तुलना भारत से नहीं की जा सकती। हमें यथार्थवादी होना होगा।”
अदालत में माहौल उस समय हल्का हो गया, जब न्यायमूर्ति मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा,“कुत्ते और बिल्लियां आम तौर पर दुश्मन होती हैं, शायद बिल्लियों को बढ़ावा देना चाहिए।”इस टिप्पणी पर कोर्ट रूम में हंसी गूंज उठी, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश गंभीर था—समस्या का समाधान भावनाओं से नहीं, व्यावहारिक नीति से निकलेगा।
मामले की संवैधानिक गंभीरता को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से कहा कि यह मुद्दा अब केवल स्थानीय प्रशासन की विफलता नहीं रहा, बल्कि संवैधानिक सीमाओं और संस्थागत जिम्मेदारी का प्रश्न बन चुका है।
उन्होंने दलील दी कि देश में पहले से ही पशु कल्याण और आवारा पशुओं के प्रबंधन को लेकर कानूनी ढांचा मौजूद है, लेकिन समस्या नियमों की कमी नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। जब तक नगर निगम और राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएंगी, तब तक अदालतों पर बोझ बढ़ता रहेगा।
सुनवाई के अंत में न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने बेहद संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि पशुओं के प्रति करुणा जरूरी है, लेकिन इसे जन सुरक्षा की कीमत पर नहीं देखा जा सकता। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी नीति का पहला उद्देश्य नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा होना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा,“हम भावनात्मक वीडियो की प्रतियोगिता नहीं चाहते। सच्चाई यह है कि समस्या का समाधान मानवीय भी होना चाहिए और व्यावहारिक भी।”
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अगली सुनवाई की तारीख 13 जनवरी 2026 तय की और कार्यवाही स्थगित कर दी। अदालत ने संकेत दिए कि अगली सुनवाई में ठोस कार्ययोजना और जिम्मेदारी तय करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।यह मामला अब केवल आवारा कुत्तों का नहीं रहा, बल्कि यह दिखाता है कि नीति निर्माण, प्रशासनिक निष्क्रियता और संवैधानिक संतुलन जब एक साथ टकराते हैं, तो समाधान निकालना कितना जटिल हो जाता है।

