छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में घटित यह घटना कोई साधारण अपराध नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की सोच, संवेदनशीलता और नैतिक पतन का भयावह उदाहरण है। स्कूल जाते समय खेत से कुछ मटर तोड़ लेने पर दो नाबालिग बच्चों को जिस तरह हाथ-पैर बांधकर पीटा गया, वह इस सवाल को जन्म देता है कि क्या आज भी हम सभ्य समाज होने का दावा कर सकते हैं?
यह मानना कठिन है कि पढ़ने की उम्र के बच्चों की इतनी-सी गलती पर कोई वयस्क व्यक्ति इस हद तक अमानवीय हो सकता है। बच्चे माफी मांगते रहे, रहम की गुहार लगाते रहे, लेकिन आरोपी का दिल नहीं पसीजा। यह केवल क्रोध नहीं था, यह अहंकार, ताकत के नशे और कानून के प्रति अवमानना का खुला प्रदर्शन था।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि आरोपी ने बच्चों को सार्वजनिक रूप से बांधकर पीटा। यह केवल शारीरिक हिंसा नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना भी है, जिसके दुष्परिणाम बच्चों के मन पर लंबे समय तक रह सकते हैं। ऐसे अनुभव बच्चों में डर, असुरक्षा और समाज के प्रति अविश्वास पैदा करते हैं।
यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आज भी “कानून अपने हाथ में लेने” की मानसिकता कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए है। छोटी-छोटी बातों पर हिंसा, खासकर बच्चों के खिलाफ, बताती है कि समाज में संवेदना और संवाद की जगह गुस्से ने ले ली है।
पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई और आरोपी की गिरफ्तारी राहत की बात है, लेकिन केवल गिरफ्तारी से समस्या का समाधान नहीं होगा। सवाल यह है कि क्या ऐसे मामलों में सख्त और उदाहरण प्रस्तुत करने वाली सजा दी जाएगी? अगर ऐसा नहीं हुआ तो ऐसी घटनाएँ दोहराई जाती रहेंगी।
बाल अधिकार कानून, किशोर न्याय अधिनियम और मानवाधिकारों की बातें केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। ज़मीनी स्तर पर इनका कड़ाई से पालन जरूरी है। बच्चों की गलती सुधार से ठीक की जाती है, न कि हिंसा से। उन्हें डराकर नहीं, समझाकर बेहतर नागरिक बनाया जाता है।यह भी आवश्यक है कि समाज स्वयं आगे आए। पड़ोसी, गांव, पंचायत और सामाजिक संगठन अगर समय रहते हस्तक्षेप करते, तो शायद यह घटना इतनी भयावह न होती। चुप्पी भी कई बार अपराध को बढ़ावा देती है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम स्पष्ट संदेश दें— खेत की मटर की कीमत कुछ रुपये हो सकती है, लेकिन एक बच्चे का सम्मान और सुरक्षा अनमोल है।जो भी इसे कुचलने की कोशिश करेगा, उसे कानून की पूरी सख्ती का सामना करना होगा।यह घटना केवल बलरामपुर की नहीं है, यह पूरे समाज के लिए चेतावनी है। अगर आज हम खामोश रहे, तो कल यही बर्बरता और अधिक निडर होकर दोहराई जाएगी।

