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8 माह बाद भी…..300 बच्चों की प्यास राजनीतिक एजेंडे में जगह नहीं बना पाई?

8 महीने बीत गए, चिट्ठियाँ चलती रहीं… बच्चे आज भी प्यासे!
बस्तर में अफसरों की फाइलों में कैद हो गया स्कूलों का पानी

बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर के नगर निगम क्षेत्र के ठीक बीचों-बीच स्थित प्राथमिक, माध्यमिक और हाई स्कूल कुम्हारपारा/केवड़ाबुड़ा का यह हाल किसी दूरस्थ आदिवासी अंचल का नहीं, बल्कि शहर के दिल में बसे उस स्कूल का है, जहाँ सैकड़ों बच्चे आज भी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं।

यह तस्वीर किसी प्राकृतिक आपदा की देन नहीं है, बल्कि प्रशासनिक बेरुखी, राजनीतिक उदासीनता और सत्ता की प्राथमिकताओं की असली पहचान है। आठ महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन बच्चों की प्यास आज भी कागज़ों में उलझी हुई है।

स्कूल प्रबंधन ने बार-बार शासन-प्रशासन को आगाह किया, गुहार लगाई, पत्र लिखे…..लेकिन हर बार वही आश्वासन, वही फाइल आगे बढ़ाने का खेल और वही ढाक के तीन पात।दिनांक 21 मई 2025 को विद्यालय के प्राचार्य ने जिला शिक्षा अधिकारी, बस्तर को स्पष्ट रूप से बताया कि विद्यालय में 300 से अधिक छात्र-छात्राएँ अध्ययनरत हैं और पूरे परिसर में पानी का सिर्फ एक नल उपलब्ध है।

यह एकमात्र नल मध्यान्ह भोजन पकाने, बर्तन धोने, हाथ-मुंह साफ करने और शौचालय उपयोग जैसी तमाम जरूरतों का बोझ ढो रहा है और विडंबना यह कि वह नल भी अधिकतर समय सूखा रहता है।पानी की कमी के कारण मध्यान्ह भोजन योजना जैसी केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना भी प्रभावित हो रही है, लेकिन सरकारी कागज़ों में बच्चे रोज़ “पूरा भोजन प्राप्त” कर रहे हैं, जमीनी सच्चाई चाहे कुछ भी हो।

विद्यालय में शौचालय बने हैं, पर पानी के बिना वे महज़ ईंट-पत्थर का ढांचा बनकर रह गए हैं। खासकर छात्राओं के लिए यह स्थिति न सिर्फ असुविधाजनक, बल्कि अपमानजनक भी है।स्थिति की गंभीरता को स्वयं स्वीकार करते हुए, स्कूल प्रबंधन द्वारा किए गए पत्राचार के पूरे छह माह बीत जाने के बाद शिक्षा विभाग की नींद टूटी और 04 नवंबर 2025 को जिला शिक्षा अधिकारी बस्तर, बलिराम बघेल ने कलेक्टर को पत्र लिखकर विद्यालयों में बोरवेल कराए जाने की अनुशंसा की।

इस पत्र में साफ तौर पर माना गया कि पानी की अनुपलब्धता के कारण मध्यान्ह भोजन, स्वच्छता और बच्चों की बुनियादी जरूरतें प्रभावित हो रही हैं। यानी समस्या न सिर्फ सामने थी, बल्कि प्रशासन ने उसे स्वीकार भी किया।फिर सवाल उठता है……जब समस्या दर्ज हो चुकी, समाधान सुझा दिया गया, तो आठ महीने से अधिक समय बाद भी जमीन पर एक इंच काम क्यों नहीं हुआ?

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन तीनों स्कूल परिसरों से सटा हुआ संयुक्त संचालक शिक्षा (जेडी कार्यालय) स्वयं मौजूद है, बावजूद इसके महीनों से बच्चों की प्यास, शिकायतों और पत्राचार के बाद भी किसी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं होना, पूरे शिक्षा और प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।

क्या नगर निगम क्षेत्र में स्थित स्कूल के बच्चों की प्यास इतनी सस्ती है कि उसे सिर्फ पत्राचार की खानापूर्ति समझ लिया गया? विडंबना देखिए इसी नगर निगम क्षेत्र में सौंदर्यीकरण, सड़क, नाली, चौक-चौराहों पर लाखों रुपये फूंक दिए जाते हैं, लेकिन एक स्कूल के लिए एक बोरवेल तक नहीं हो पाता।

और इससे भी बड़ा तंज़ यह है कि चुनाव के वक्त इसी स्कूल परिसर में वीआईपी नेताओं, मतदान कर्मियों और मतदाताओं के लिए पानी, टेंट और तमाम सुविधाएँ रातों-रात उपलब्ध करा दी जाती हैं।लेकिन साल भर स्कूल आने वाले बच्चों के लिए वही व्यवस्था करना प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को भारी पड़ता है।

यहाँ सवाल सीधे-सीधे जगदलपुर विधायक और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण देव से भी बनता है। नगर निगम क्षेत्र के बीचों-बीच स्थित स्कूल की यह दुर्दशा क्या उनकी नजरों से ओझल है, या बच्चों की प्यास राजनीतिक एजेंडे में जगह नहीं बना पाई?

प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते किरण देव सरकार की उपलब्धियों का मंचों से बखान करते हैं, लेकिन उनके ही विधानसभा क्षेत्र में बच्चे पानी के बिना पढ़ने को मजबूर हैं….यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है?यह मामला सिर्फ शिक्षा विभाग का नहीं, बल्कि नगर निगम, जिला प्रशासन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों सभी की सामूहिक विफलता का आईना है।

हर विभाग जिम्मेदारी दूसरे पर डालकर खुद को पाक-साफ साबित करने में लगा है, और इस बीच सबसे बड़ा खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।यह सिर्फ पानी का संकट नहीं है, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य, सम्मान और शिक्षा के अधिकार पर सीधा हमला है और यह हमला फाइलों की चुप्पी से किया जा रहा है।

जब शिकायत, अनुशंसा और प्रशासनिक स्वीकृति सब मौजूद है, तब भी समाधान न होना संवेदनहीन शासन का सबसे बड़ा सबूत है।अब सवाल यह नहीं है कि बोरवेल कब होगा, बल्कि यह है कि इन आठ महीनों की लापरवाही, उदासीनता और चुप्पी की जिम्मेदारी कौन लेगा?

नगर निगम क्षेत्र के बीचों-बीच स्थित स्कूल में बच्चों को प्यासा रखना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।और अगर अब भी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी नहीं टूटी, तो यह चुप्पी भी उतनी ही दोषी मानी जाएगी, जितनी यह लापरवाही।

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