आज का सियासी घटनाक्रम पश्चिम बंगाल और देश दोनों के लिए एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक विमर्श बन चुका है। कोलकाता हाई कोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ख़िलाफ दायर याचिका ने न केवल एक जांच प्रक्रियात्मक विवाद खड़ा किया है, बल्कि राज्य-केंद्र के बीच तात्कालिक तनाव को भी उजागर किया है।
ईडी की याचिका का मूल आरोप यह है कि ममता बनर्जी ने I-PAC से जुड़े ठिकानों की तलाशी पर हस्तक्षेप किया, जांच अधिकारियों के काम में बाधा डाली और सबूतों को हटाया। यह मामला 2020 के कोयला घोटाले से जुड़ी मनी-लॉन्ड्रिंग जांच की प्रक्रिया से भी संबंधित बताया जा रहा है, जिसमें I-PAC कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के घरों की तलाशी भी शामिल है।
केंद्र की तरफ़ से दिये गये इस आरोप की गंभीरता को समझना ज़रूरी है। अगर किसी राज्य का निर्वाचित मुख्यमंत्री कानूनी जांच एजेंसियों के काम में हस्तक्षेप करता है, तो यह सीधे-सीधे लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। अदालत में इसी मुद्दे की सुनवाई अब 14 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी गयी है, जो अदालत परिसर में हुए भारी हंगामे और असहज माहौल का परिणाम भी है।
दूसरी तरफ़, ममता बनर्जी और उनके समर्थक इस कार्रवाई को राजनीतिक दुरुपयोग के रूप में देख रहे हैं। चुनावी माहौल के बीच केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी दलों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है, ऐसा तृणमूल कांग्रेस का दावा रहा है। इसी के चलते बनर्जी ने कोलकाता की सड़कों पर भी विरोध मार्च निकाला, जिसमें हजारों समर्थक शामिल हुए और यह संघर्ष राजनीतिक गलियारे से न्यायपालिका तक पहुँच गया।
इस घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिकरण के बीच की सीमाएं धुंधली होती नजर आ रही हैं। एक ओर जहाँ जांच एजेंसी कह रही है कि उसके अधिकारी शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से तलाशी अभियान चला रहे थे, दूसरी ओर राज्य सरकार इसे केंद्रीय सत्ता का राजनीतिक शोषण बता रही है।
ऐसे समय में न्यायपालिका का दायित्व और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उच्चतम न्यायालय और हाई कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का शासन और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा बिना किसी राजनीतिक दबाव के हो सके। हंगामे वाले दौर में भी अदालत ने मामले की अगली सुनवाई का समय तय किया है — जो संकेत देता है कि न्याय व्यवस्था स्थिर और व्यवस्थित कार्यवाही पर ज़ोर दे रही है।
देश का लोकतंत्र तभी सुदृढ़ रह सकता है जब जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता, राजनीति-सेना-न्यायपालिका की सीमाओं और कानूनी निष्पक्षता को बराबर स्थान मिले। इस सियासी-कानूनी टकराहट को नियंत्रित करने और संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब केवल वकीलों या नेताओं की नहीं है — बल्कि पूरे लोकतांत्रिक समाज की है।

