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स्वास्थ्य सेवाओं की जमीन पर असफलता — डरावना यथार्थ

हाल ही में बस्तर के कोंटा इलाके से सामने आई तस्वीरें और घटनाएँ इस बात का जीता-जागता प्रमाण हैं कि स्वास्थ्य विभाग में “मजबूत व्यवस्था” के गरिमामय दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितनी खाई बनी हुई है। कोंडासावली पंचायत के एक गंभीर रूप से घायल ग्रामीण को जब स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस सुविधा उपलब्ध नहीं हुई, तो परिजन मजबूरन उसे खाट पर लादकर लगभग 5 किलोमीटर तक पैदल अस्पताल ले गए — एक ऐसी स्थिति जो किसी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती।

देश में 108 जैसी आपातकालीन एंबुलेंस सेवाएं इमरजेंसी स्थितियों में रोगियों को समय पर अस्पताल तक पहुँचाने के लिए चलाई जाती हैं, लेकिन ऐसे कई मामले हैं जहाँ इन सेवाओं की अनउपलब्धता या विलंब ने मरीजों को और उनके परिवारों को असहाय स्थिति में छोड़ दिया है। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश में 108 एंबुलेंस के देर से पहुँचने के कारण एक मरीज को निजी वाहन से अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी मौत हो गई — जिससे स्पष्ट होता है कि समय-समय पर आपात सेवाओं की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है।

ये केवल एक स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि भारत के कई हिस्सों से ऐसी ही चेतावनी देती तस्वीरें और घटनाएँ सामने आती रहती हैं — जैसे कि कर्नाटक में मरीज को दो घंटे एंबुलेंस न मिलने पर मालवाहक वाहन में ले जाया जाना, या झारखंड में एक गर्भवती महिला को खाट पर नदी पार करवाकर अस्पताल तक पहुँचाया जाना पड़ा।

स्वास्थ्य सेवाओं की ये विफलताएँ सिर्फ बस्तर या ग्रामीण इलाके की समस्या नहीं हैं, बल्कि पूरे देश में आपात स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क की खामियों को उजागर करती हैं। अस्पतालों में एंबुलेंस, विशेषज्ञ स्टाफ, और समन्वित आपातकालीन प्रोटोकॉल का अभाव — ये सभी मिलकर जीवन-मृत्यु के बीच की दूरी को और भी घातक बना देते हैं।

जब नागरिकों को अपने प्रियजनों को खाट पर लादकर या निजी साधनों से अस्पताल तक ले जाना पड़े, तो न सिर्फ सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा होता है, बल्कि उस सरकार की प्राथमिकताओं पर भी संदेह पैदा होता है जिसने “सर्वजन के लिए स्वास्थ्य” का नारा दिया है।

अब निर्णय का समय है। स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाना, आपातकालीन सेवाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना, एंबुलेंस नेटवर्क को समय-बद्ध और सुदृढ़ करना — ये सिर्फ प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक मांग होनी चाहिए। कागजों पर योजनाएँ पर्याप्त नहीं — जमीन पर परिणाम चाहिए।

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