छत्तीसगढ़ में एक बार फिर सरकारी व्यवस्था की बड़ी चूक सामने आई है। किसानों से खरीदा गया करोड़ों रुपये का धान बारिश और बदइंतजामी की भेंट चढ़ गया। बस्तर जिले के कई संग्रहण केंद्रों में पड़ा हजारों मीट्रिक टन धान समय पर उठाव नहीं होने के कारण सड़ने लगा है, जिससे न सिर्फ सरकारी खजाने को नुकसान हुआ है बल्कि किसानों की मेहनत भी सवालों में घिर गई है।
जानकारी के मुताबिक, पिछले खरीदी सीजन का धान अब तक गोदामों से नहीं उठाया जा सका। लगातार बारिश के चलते धान भीग गया, बोरे गल गए और कई जगहों पर अनाज काला पड़ चुका है। हालत यह है कि अब सड़े धान को नए बोरों में भरकर किसी तरह उठाव की कोशिश की जा रही है, लेकिन नुकसान हो चुका है।
स्थानीय स्तर पर धान खराब होने की वजह समय पर डीओ जारी न होना, कमजोर तिरपाल और प्रशासनिक लापरवाही बताई जा रही है। जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आ रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि हजारों टन धान अब उपयोग लायक नहीं बचा।
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी राज्य के अन्य जिलों में धान खराब होने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन हर बार जांच और कार्रवाई की बात कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। सवाल यह है कि जब पहले से बारिश का अनुमान था, तो धान के सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
मामले के सामने आने के बाद प्रशासन ने जांच की बात कही है, लेकिन किसानों और आम जनता का भरोसा अब केवल जांच घोषणाओं से बहाल नहीं होने वाला। जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और भविष्य में ऐसी लापरवाही दोहराई न जाए।
यह घटना सिर्फ धान के सड़ने की नहीं, बल्कि व्यवस्था के सड़ने की कहानी भी बयां करती है।

