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CGPSC भर्ती घोटाला:“खेत की रखवाली करने वाला ही फसल खा गया”

बिलासपुर / रायपुर। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) भर्ती घोटाले ने न केवल राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि उस भरोसे को भी तोड़ दिया है, जिस पर लाखों युवा वर्षों तक कठिन मेहनत कर अपने भविष्य का सपना देखते हैं। इस बहुचर्चित घोटाले में बिलासपुर हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी— “प्रश्नपत्र लीक करना हत्या से भी अधिक गंभीर अपराध है”—ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

यह टिप्पणी कोई भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था, सामाजिक प्रभाव और युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखकर दिया गया एक ऐतिहासिक न्यायिक दृष्टिकोण है।

CGPSC: जहां से ईमानदार अफसर निकलने चाहिए थे

CGPSC का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि राज्य को योग्य, निष्पक्ष और ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी मिल सकें। डिप्टी कलेक्टर, DSP, नायब तहसीलदार जैसे पदों पर चयन वही लोग पाएं, जो कड़ी प्रतिस्पर्धा और पारदर्शी प्रक्रिया से गुजरें।

लेकिन 2020 से 2022 के बीच आयोजित परीक्षाओं में जो हुआ, उसने यह साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार अब सिस्टम के भीतर तक घुस चुका है।

घोटाले की शुरुआत: जब शक हकीकत में बदला

2020–22 की CGPSC परीक्षाओं के बाद कुछ नाम ऐसे सामने आए, जिनके चयन ने सवाल खड़े कर दिए। कुछ चयनित अभ्यर्थी सीधे अधिकारियों के रिश्तेदार निकले,मेरिट लिस्ट में असामान्य उछाल, इंटरव्यू और लिखित परीक्षा के अंकों में गड़बड़ी,शुरुआत में इन सवालों को दबाने की कोशिश हुई, लेकिन प्रतियोगी छात्रों का आक्रोश और सामाजिक दबाव इतना बढ़ा कि मामला जांच एजेंसियों तक पहुंच गया।

EOW/ACB की जांच और चौंकाने वाले खुलासे

आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) और एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की जांच में जो सामने आया, उसने व्यवस्था की जड़ों को हिला दिया। जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि CGPSC के तत्कालीन अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी,परीक्षा नियंत्रक आरती वासनिक,डिप्टी परीक्षा नियंत्रक ललित गनवीर ने मिलकर प्रश्नपत्र की गोपनीयता भंग की, और इसका लाभ अपने करीबी लोगों को पहुंचाया। यह वही अधिकारी थे, जिन पर पूरी परीक्षा प्रक्रिया की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी थी।

खेत की रखवाली करने वाला ही फसल खा गया”

बिलासपुर हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक कहावत नहीं, बल्कि पूरे घोटाले का सार है। कोर्ट ने साफ कहा कि….जिन लोगों को परीक्षा की निष्पक्षता की रक्षा करनी थी, वही लोग उसके सबसे बड़े दुश्मन बन गए। यह कथन यह दर्शाता है कि यह अपराध बाहरी नहीं, बल्कि अंदर से किया गया विश्वासघात है।

CBI जांच: मामला क्यों हुआ राष्ट्रीय स्तर का

राज्य एजेंसियों की जांच के बाद सरकार को यह स्वीकार करना पड़ा कि मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार का संकेत देता है। इसके बाद जांच CBI को सौंप दी गई।

CBI ने: डिजिटल सबूत,कॉल डिटेल रिकॉर्ड,चयन सूची,परीक्षा से जुड़े गोपनीय दस्तावेज अपने कब्जे में लिए और जांच को आगे बढ़ाया।

जमानत पर हाईकोर्ट का सख्त रुख

तीनों मुख्य आरोपियों ने जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पहली जमानत याचिका खारिज,दूसरी जमानत याचिका भी खारिज

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी प्रभावशाली पदों पर रह चुके हैं,सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका है जांच अभी जारी है अपराध का सामाजिक प्रभाव अत्यंत व्यापक है

हत्या से भी गंभीर अपराध — क्यों?

हाईकोर्ट की सबसे चर्चित टिप्पणी यही रही। न्यायालय के अनुसार: हत्या एक व्यक्ति या परिवार को प्रभावित करती है लेकिन प्रश्नपत्र लीक हजारों योग्य युवाओं का भविष्य नष्ट करता है,ईमानदार मेहनत को हतोत्साहित करता है,सिस्टम पर से भरोसा खत्म करता है,अयोग्य लोगों को प्रशासन में बैठाता है इसलिए यह अपराध सामूहिक सामाजिक अपराध है।

युवाओं के साथ सबसे बड़ा धोखा

CGPSC घोटाला केवल कानूनी मामला नहीं, बल्कि एक पीढ़ी के साथ किया गया धोखा है। वह युवा जो गांवों से शहरों तक संघर्ष करते हैं,जो सालों तक किताबों में डूबे रहते हैं,जो एक-एक अंक के लिए लड़ते हैं,उनके सपनों को चंद लोगों ने सत्ता और रिश्तों के बल पर कुचल दिया।

प्रशासन पर सवाल: क्या चयन रद्द होंगे?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है…क्या संदिग्ध चयन रद्द किए जाएंगे?क्या चयनित अफसरों की सेवा समाप्त होगी?क्या CGPSC की पूरी प्रणाली में सुधार होगा?यह सवाल केवल अदालत नहीं, बल्कि समाज और सरकार से भी जवाब मांगते हैं।

यह फैसला क्यों है ऐतिहासिक?

बिलासपुर हाईकोर्ट का यह आदेश: देश भर की PSC/UPSC परीक्षाओं के लिए चेतावनी है यह संदेश देता है कि… भर्ती परीक्षा से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा,भविष्य में ऐसे मामलों में जमानत पाना आसान नहीं होगा

व्यवस्था की अग्निपरीक्षा

CGPSC घोटाला छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अग्निपरीक्षा है। यदि दोषियों को सजा नहीं मिली, तो यह संदेश जाएगा कि मेहनत बेकार है, सिस्टम बिकाऊ है। लेकिन अगर न्याय सख्त हुआ, तो यह भरोसा लौटेगा कि…अभी भी संविधान और कानून जिंदा हैं।

यह रिपोर्ट केवल एक खबर नहीं, बल्कि सवाल है…. क्या मेहनत करने वाला युवा अब भी इस सिस्टम पर भरोसा कर सकता है?

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