आज छत्तीसगढ़ ने इतिहास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने 2027 में होने वाली देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना (Census 2027) की तैयारियों को औपचारिक रूप से शुरू कर दिया है, जो न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत के लिए एक बड़े बदलाव की शुरुआत है।
जनगणना एक प्रशासनिक प्रक्रिया से कहीं बढ़कर है — यह लोकतांत्रिक योजना, संसाधन आवंटन और सामाजिक नीतियों की नींव है। छत्तीसगढ़ में आयोजित राज्य स्तरीय समन्वय समिति (SLCCC) की बैठक ने दिखाया कि शासन अब डेटा-आधारित निर्णयों की ओर अग्रसर है। यही वह आधार है जिस पर भविष्य की नीतियाँ, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाएँ तय होंगी।
इस बार की जनगणना पारंपरिक कागज़ आधारित विधि से हटकर डिजिटल रूप में होगी, जिसमें डेटा मोबाइल एप्लीकेशन और केंद्रीकृत वेब पोर्टल के द्वारा एकत्र किया जाएगा। यह परिवर्तन न सिर्फ प्रक्रिया को तेज और अधिक सटीक बनाता है, बल्कि नागरिकों के लिए भी इसे सहज और उत्तरदायी बनाता है। लोगों को स्वयं अपनी जानकारी दर्ज करने (self-enumeration) का विकल्प मिलेगा, जिससे सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।
छत्तीसगढ़ में लगभग 63,000 विभागीय और क्षेत्रीय कार्यकर्ता इस अभ्यास का हिस्सा होंगे, जिनका प्रशिक्षण और समन्वय सरकार द्वारा सुनिश्चित किया जा रहा है। यह बड़ा आयोजन राज्य की सामाजिक-आर्थिक तस्वीर को स्पष्ट रूप से सामने लाएगा और योजनाओं का लक्ष्य निर्धारण वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप करेगा।
हालांकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। डिजिटल जनगणना संचालन के लिए तकनीकी ढाँचे के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल साक्षरता का प्रश्न महत्वपूर्ण रहेगा। ऐसे में समूचे प्रदेश में लोगों को तकनीकी जानकारी और सहायता उपलब्ध कराना एक बड़ी जिम्मेदारी होगी। इसके बिना डिजिटल रूपांतरण का लक्ष्य अधूरा रह सकता है।
फिर भी, यह प्रयास यह संकेत देता है कि छत्तीसगढ़ डिजिटल परिवर्तन और सूचनात्मक शासन की दिशा में अग्रसर है। यह सिर्फ एक संख्या की गिनती नहीं है — यह हमारी सामाजिक संरचना, विकास की प्राथमिकताओं और भविष्य की योजनाओं का आधार तैयार करने वाली प्रक्रिया है। छत्तीसगढ़ का यह प्रयास न सिर्फ स्थानीय, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक मिसाल बन सकता है।

