छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका लंबे समय तक देश में नक्सलवाद, हिंसा और भय का पर्याय बना रहा है। यहां के सैकड़ों गांव ऐसे रहे हैं, जहां वर्षों तक न तो सरकारी योजनाएं पहुंच पाईं और न ही लोकतंत्र के प्रतीक राष्ट्रीय पर्व मनाने की आज़ादी मिल सकी। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। इसी बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल 26 जनवरी को देखने को मिली, जब बस्तर के 47 गांवों में पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया।
यह सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्व का आयोजन नहीं था, बल्कि यह उन हजारों ग्रामीणों के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था, जिन्होंने जीवन में पहली बार तिरंगा फहराया, राष्ट्रगान सुना और संविधान के प्रति सम्मान व्यक्त किया। दशकों तक नक्सली आतंक के कारण जिन गांवों में राष्ट्रीय प्रतीकों को देखना भी अपराध माना जाता था, वहां अब खुले मंच से लोकतंत्र का उत्सव मनाया गया।
डर से आज़ादी तक का सफर
बस्तर के कई इलाकों में नक्सलियों का प्रभाव इतना गहरा था कि ग्रामीणों को न तो स्वतंत्र रूप से मतदान करने दिया जाता था और न ही सरकारी कार्यक्रमों में भाग लेने की अनुमति थी। गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस जैसे पर्वों को मनाना जान जोखिम में डालने जैसा था। तिरंगा फहराना या ‘जन गण मन’ गाना नक्सलियों की नजर में “सरकार का समर्थन” माना जाता था।
ऐसे माहौल में पीढ़ियों ने अपने बचपन और जवानी गुजारी। कई लोगों ने बताया कि उन्होंने स्कूल की किताबों में तो तिरंगा देखा था, लेकिन कभी अपने गांव में उसे फहराते नहीं देखा। बच्चों को यह तक नहीं पता था कि गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है।
47 गांवों में बदली तस्वीर
इस साल गणतंत्र दिवस पर बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा जिलों के कुल 47 गांवों में तिरंगा फहराया गया। इन गांवों में कई ऐसे इलाके भी शामिल हैं, जिन्हें कभी “कोर नक्सल एरिया” माना जाता था। यहां सुरक्षाबलों और प्रशासन की मौजूदगी पहले लगभग न के बराबर थी।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर गांवों में छोटे-बड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए। कहीं स्कूल के बच्चों ने देशभक्ति गीत गाए, तो कहीं बुजुर्गों की आंखों में आंसू थे……. खुशी और गर्व के आंसू। कई ग्रामीणों ने कहा कि उन्होंने पहली बार महसूस किया कि वे भी इस देश के नागरिक हैं और संविधान उन्हें अधिकार देता है।
सुरक्षा और प्रशासन की भूमिका
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी भूमिका सुरक्षा बलों की सतत कार्रवाई और प्रशासन की रणनीति की रही है। पिछले कुछ वर्षों में बस्तर क्षेत्र में बड़ी संख्या में सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं। इन कैंपों ने न केवल नक्सलियों की गतिविधियों पर अंकुश लगाया, बल्कि ग्रामीणों को सुरक्षा का भरोसा भी दिया।
सुरक्षा बलों की मौजूदगी से धीरे-धीरे प्रशासन गांवों तक पहुंच सका। पहले जहां सरकारी अधिकारी जाने से डरते थे, अब वहीं ग्राम सभाएं हो रही हैं, योजनाएं लागू हो रही हैं और राष्ट्रीय पर्व मनाए जा रहे हैं।
लोकतंत्र की वापसी का प्रतीक
47 गांवों में गणतंत्र दिवस का आयोजन लोकतंत्र की जमीनी वापसी का संकेत माना जा रहा है। यह संदेश साफ है कि अब इन इलाकों में संविधान सर्वोपरि है, न कि बंदूक की भाषा।
राजनीतिक और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र की असली मजबूती तभी दिखाई देती है, जब उसका प्रभाव देश के सबसे दूरस्थ और संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुंचे। बस्तर के इन गांवों में गणतंत्र दिवस मनना इसी दिशा में बड़ा कदम है।
बच्चों के लिए बदला भविष्य
इन गांवों के बच्चों के लिए यह बदलाव खास मायने रखता है। पहले जहां शिक्षा व्यवस्था लगभग ठप थी, अब स्कूल नियमित रूप से चल रहे हैं। गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों में बच्चों ने कविता, भाषण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।
शिक्षकों का कहना है कि बच्चों में अब देश, संविधान और अपने अधिकारों को लेकर जिज्ञासा बढ़ी है। वे सवाल पूछ रहे हैं, सपने देख रहे हैं और आगे बढ़ना चाहते हैं। यह वही पीढ़ी है, जो भविष्य में बस्तर की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
विकास की दस्तक
लोकतंत्र के साथ-साथ विकास भी इन इलाकों में कदम रख रहा है। कई गांवों तक अब सड़कें पहुंच चुकी हैं। मोबाइल नेटवर्क और बिजली की सुविधा धीरे-धीरे बहाल हो रही है। स्वास्थ्य केंद्रों और उप-स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा रही है।
कुछ इलाकों में बैंकिंग सेवाएं भी शुरू हुई हैं, जिससे ग्रामीणों को पहली बार सीधे आर्थिक व्यवस्था से जुड़ने का मौका मिला है। सरकार की योजनाएं, जो पहले सिर्फ कागजों तक सीमित थीं, अब जमीन पर उतरती दिख रही हैं।
ग्रामीणों की बदली सोच
गणतंत्र दिवस के आयोजन के दौरान कई ग्रामीणों ने खुलकर अपनी बात रखी। उनका कहना था कि पहले वे डर के कारण चुप रहते थे, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। उन्हें लगता है कि सरकार और प्रशासन अब उनके साथ है।
कुछ बुजुर्गों ने कहा कि उन्होंने जीवन में पहली बार किसी राष्ट्रीय पर्व को अपने गांव में मनते देखा है। यह अनुभव उनके लिए अविस्मरणीय है। कई महिलाओं ने भी कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जो पहले संभव नहीं था।
सरकार का संदेश
राज्य सरकार ने इस आयोजन को बस्तर के लिए ऐतिहासिक बताया है। मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ एक शुरुआत है। आने वाले समय में और भी गांवों को इस बदलाव से जोड़ा जाएगा।
सरकार का दावा है कि बस्तर को अब केवल नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि संभावनाओं और विकास के क्षेत्र के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
नक्सलवाद के खिलाफ मनोवैज्ञानिक जीत
विशेषज्ञों का मानना है कि 47 गांवों में गणतंत्र दिवस मनाना नक्सलवाद के खिलाफ एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत है। नक्सल आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत डर और नियंत्रण रहा है। जब गांव खुलेआम तिरंगा फहराते हैं, तो यह उस डर के टूटने का संकेत है।यह संदेश आसपास के अन्य गांवों तक भी जाता है कि बदलाव संभव है और लोकतंत्र की राह पर चलना सुरक्षित है।
चुनौतियां अभी बाकी
हालांकि हालात में सुधार हुआ है, लेकिन चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। बस्तर अभी भी संवेदनशील क्षेत्र है। कई इलाके ऐसे हैं जहां विकास और सुरक्षा दोनों को और मजबूत करने की जरूरत है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव को स्थायी बनाने के लिए लगातार संवाद, विकास और विश्वास निर्माण जरूरी है। केवल सुरक्षा कार्रवाई से नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव से ही स्थायी शांति संभव है।
संविधान से जुड़ाव
गणतंत्र दिवस का सबसे बड़ा महत्व संविधान से जुड़ाव है। इन गांवों में संविधान की प्रस्तावना पढ़ी गई, लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में बताया गया। यह प्रयास ग्रामीणों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने में अहम साबित हो सकता है।
कई जगह ग्राम सभाओं में लोगों ने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं और समाधान की मांग की। यह लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक संकेत है।
भविष्य की उम्मीद
इन 47 गांवों में गणतंत्र दिवस का आयोजन एक उम्मीद की कहानी है। यह दिखाता है कि अगर सही रणनीति, इच्छाशक्ति और स्थानीय सहयोग हो, तो सबसे कठिन हालात भी बदले जा सकते हैं।
आज जिन गांवों में तिरंगा फहरा है, वहां आने वाले वर्षों में स्कूलों की घंटियां, अस्पतालों की गतिविधियां और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे…..ऐसी उम्मीद की जा रही है।
कुल मिलाकर, बस्तर के 47 गांवों में पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया जाना केवल एक खबर नहीं, बल्कि इतिहास का हिस्सा है। यह कहानी डर से आज़ादी, अंधेरे से उजाले और हिंसा से लोकतंत्र की ओर बढ़ते कदमों की कहानी है।
यह आयोजन बताता है कि लोकतंत्र केवल शहरों और सुरक्षित इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के हर कोने तक पहुंचने की क्षमता रखता है। बस्तर की यह नई सुबह आने वाले समय में पूरे क्षेत्र के लिए एक मिसाल बन सकती है।

