विश्वविद्यालय परिसरों में राजनीतिक असहमति कोई नई बात नहीं है। सवाल उठाना, विरोध करना और सत्ता की आलोचना करना लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन जब विरोध की भाषा “मोदी तेरी क़ब्र होगी” जैसे नारे तक पहुँच जाती है, तो यह असहमति नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं को लांघने का मामला बन जाता है। हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा कहाँ समाप्त होती है और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी कहाँ से शुरू होती है।
ऐसे नारे किसी नीतिगत आलोचना या वैचारिक असहमति को व्यक्त नहीं करते, बल्कि हिंसक आशय और व्यक्तिगत धमकी का संकेत देते हैं। लोकतंत्र में किसी भी निर्वाचित प्रतिनिधि—चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्यों न हो—की आलोचना पूरी तरह वैध है, लेकिन उसे मृत्यु या विनाश की भाषा में ढालना न तो नैतिक है और न ही संवैधानिक। यह भाषा भय पैदा करती है, समाज को बाँटती है और परिसर के शैक्षणिक माहौल को विषाक्त बनाती है।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई करें। कार्रवाई का उद्देश्य बदला नहीं, बल्कि निवारण और संदेश होना चाहिए कि हिंसा या हिंसक संकेतों के लिए सार्वजनिक जीवन में कोई जगह नहीं है। साथ ही, यह भी उतना ही जरूरी है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और साक्ष्य-आधारित हो, ताकि कार्रवाई को असहमति दबाने का औजार न समझा जाए।
छात्र संगठनों और शिक्षण संस्थानों को भी आत्ममंथन करना होगा। विरोध की ताकत तर्क, तथ्य और नैतिक बल से आती है—धमकी भरी भाषा से नहीं। विश्वविद्यालय बहस के केंद्र हैं; यहाँ असहमति का स्तर ऊँचा और भाषा संयत होनी चाहिए। शिक्षक और प्रशासन मिलकर संवाद की ऐसी संस्कृति विकसित करें, जहाँ तीखी आलोचना भी गरिमा के साथ हो।
अंततः, यह प्रकरण हमें चेतावनी देता है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का संग्रह नहीं, जिम्मेदारियों का भी अनुबंध है। असहमति की रक्षा जरूरी है, लेकिन हिंसा का संकेत देने वाली भाषा पर स्पष्ट ‘न’ कहना भी उतना ही जरूरी। लोकतांत्रिक भारत की मजबूती इसी संतुलन में निहित है।

