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छत्तीसगढ़ में निलंबन और बहाली का विरोधाभासी खेल, जांच के बीच फिर कुर्सी पर बैठे अधिकारी

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नगरीय प्रशासन विभाग में इन दिनों निलंबन और बहाली को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। जिन अधिकारियों पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे, जिनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई और जिन्हें शासन ने स्वयं निलंबित किया, वही अधिकारी अब जांच पूरी होने से पहले फिर से अपने पुराने पदों पर बहाल कर दिए गए हैं। इस फैसले ने न सिर्फ प्रशासनिक हलकों में बल्कि आम जनता के बीच भी कई तरह की चर्चाओं और आशंकाओं को जन्म दे दिया है।

निलंबन की पृष्ठभूमि

जानकारी के अनुसार, नगरीय प्रशासन विभाग के अंतर्गत आने वाले कुछ नगरीय निकायों में वित्तीय अनियमितता, निर्माण कार्यों में गड़बड़ी, नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही के गंभीर आरोप सामने आए थे। प्राथमिक जांच में आरोप सही पाए जाने पर राज्य शासन ने तीन मुख्य नगर पालिका अधिकारियों (CMO) को निलंबित कर दिया था।

निलंबन की कार्रवाई को उस समय शासन की सख्त प्रशासनिक नीति के रूप में देखा गया था। यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाएगा।

जांच शुरू, लेकिन फैसला अधूरा

निलंबन के साथ ही संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई। जांच अधिकारी नियुक्त किए गए और आरोप पत्र तैयार करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी। सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में जांच पूरी होने तक अधिकारियों को निलंबन में ही रखा जाता है, ताकि वे जांच प्रक्रिया को प्रभावित न कर सकें।लेकिन इस पूरे मामले में जो हुआ, उसने प्रशासनिक प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए।

अचानक बहाली का आदेश

जांच अभी जारी ही थी कि इसी बीच राज्य शासन की ओर से आदेश जारी हुआ और निलंबित किए गए अधिकारियों को फिर से उसी पद पर बहाल कर दिया गया। आदेश में यह जरूर उल्लेख किया गया कि जांच प्रक्रिया चलती रहेगी और निलंबन अवधि का अंतिम निराकरण जांच के निष्कर्ष के आधार पर बाद में किया जाएगा।

हालांकि, शासन के इस फैसले ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि जब जांच पूरी नहीं हुई थी और आरोप समाप्त नहीं हुए थे, तो फिर बहाली की आवश्यकता क्यों महसूस की गई।

प्रशासनिक हलकों में सवाल

नगरीय प्रशासन विभाग के भीतर इस फैसले को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कई अधिकारी और कर्मचारी यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि आरोप इतने गंभीर थे कि निलंबन जरूरी समझा गया, तो फिर बिना जांच पूरी हुए बहाली कैसे उचित ठहराई जा सकती है।

कुछ अधिकारियों का कहना है कि इससे प्रशासनिक अनुशासन कमजोर होता है और भविष्य में ऐसे मामलों में गलत संदेश जाता है। वहीं, कुछ लोग इसे “तकनीकी आधार पर लिया गया फैसला” बता रहे हैं, लेकिन वे भी यह मानते हैं कि समय और प्रक्रिया को लेकर सवाल जरूर उठते हैं।

कर्मचारियों में नाराजगी

नगरीय निकायों में काम करने वाले कर्मचारियों और निचले स्तर के अधिकारियों में इस फैसले को लेकर नाराजगी देखी जा रही है। कर्मचारियों का कहना है कि छोटी-छोटी गलतियों पर उनके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को जांच के दौरान भी राहत मिल जाती है।

कर्मचारी संगठनों का मानना है कि इस तरह के फैसले से कार्य संस्कृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और ईमानदारी से काम करने वाले कर्मचारियों का मनोबल टूटता है।

जनता के बीच भी चर्चा

यह मामला अब केवल विभाग तक सीमित नहीं रह गया है। आम नागरिकों के बीच भी यह चर्चा का विषय बन गया है। लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब सरकारी पैसे और जनहित से जुड़े मामलों में गड़बड़ियों के आरोप लगते हैं, तो क्या कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है?नगरीय निकायों से जुड़े कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी है, तो बहाली का फैसला जांच पूरी होने के बाद ही लिया जाना चाहिए था।

शासन की दलील

शासन की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि बहाली का मतलब आरोपों से बरी होना नहीं है। विभागीय जांच जारी है और यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो आगे सख्त कार्रवाई की जाएगी। साथ ही यह भी कहा गया है कि निलंबन एक अस्थायी व्यवस्था होती है और प्रशासनिक आवश्यकताओं को देखते हुए बहाली का फैसला लिया गया।हालांकि, शासन की इस दलील से सभी संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं।

पूर्व मामलों से तुलना

प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि इससे पहले भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जब जांच के दौरान अधिकारियों को बहाल किया गया, लेकिन बाद में जांच लंबी खिंचती चली गई और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। यही कारण है कि इस बार भी लोग आशंकित हैं कि कहीं यह मामला भी उसी राह पर न चला जाए।

भविष्य पर असर

इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा असर प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर पड़ता दिख रहा है। यदि जांच निष्पक्ष रूप से पूरी नहीं होती या बहाली के बाद कार्रवाई कमजोर पड़ती है, तो इससे शासन की साख पर भी असर पड़ सकता है।अब सबकी निगाहें विभागीय जांच के अंतिम निष्कर्ष पर टिकी हैं। यही तय करेगा कि यह बहाली प्रशासनिक मजबूरी थी या फिर निलंबन-बहाली का एक और विरोधाभासी उदाहरण।

छत्तीसगढ़ के नगरीय प्रशासन विभाग में निलंबन और बहाली का यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता वास्तव में मजबूत है। जांच पूरी होने से पहले बहाली का फैसला जहां एक ओर शासन की मंशा पर सवाल उठाता है, वहीं दूसरी ओर यह भी जरूरी हो जाता है कि जांच निष्पक्ष, तेज और परिणाममूलक हो।

अब देखना यह होगा कि जांच किस दिशा में जाती है और क्या आरोपों के आधार पर आगे कोई ठोस कार्रवाई होती है या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाता है।

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