छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में उस समय विवाद की स्थिति बन गई जब स्कूल परिसर में महात्मा गांधी, राष्ट्रपति या अन्य राष्ट्रीय महापुरुषों की तस्वीरों के स्थान पर यीशु मसीह की तस्वीर लगाए जाने का मामला सामने आया। इस घटना के बाद ग्रामीणों और अभिभावकों में नाराजगी फैल गई और उन्होंने इसे सरकारी स्कूल की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के खिलाफ बताया। मामला सामने आते ही गांव में चर्चा का विषय बन गया और स्कूल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए जाने लगे।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी स्कूल में किसी एक धर्म विशेष से जुड़ी तस्वीर लगाना न केवल अनुचित है, बल्कि यह बच्चों के मन पर गलत प्रभाव डाल सकता है। उनका कहना है कि विद्यालय एक शासकीय संस्था है, जहां सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार होना चाहिए। ऐसे में केवल यीशु मसीह की तस्वीर लगाना पक्षपातपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब स्कूल में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर, संविधान निर्माताओं या देश के राष्ट्रपति की तस्वीरें नहीं हैं, तो फिर धार्मिक प्रतीक को प्राथमिकता क्यों दी गई।
इस पूरे मामले को लेकर अभिभावकों में भी गहरी नाराजगी देखी गई। कई अभिभावकों ने कहा कि वे अपने बच्चों को शिक्षा के लिए स्कूल भेजते हैं, न कि किसी धार्मिक विचारधारा से प्रभावित होने के लिए। उनका मानना है कि प्राथमिक स्तर के बच्चों पर ऐसे प्रतीकों का गहरा प्रभाव पड़ता है और इससे सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है। अभिभावकों ने यह भी कहा कि अगर स्कूल में किसी धर्म से जुड़ी तस्वीर लगानी ही थी, तो सभी धर्मों के प्रतीकों को समान रूप से स्थान दिया जाना चाहिए था।
ग्रामीणों ने इस मामले में संबंधित शिक्षिका पर आरोप लगाते हुए कहा कि तस्वीर उन्हीं के निर्देश पर लगाई गई थी। आरोप है कि शिक्षिका ने बिना उच्च अधिकारियों की अनुमति के स्कूल की दीवार पर यीशु मसीह की तस्वीर लगवाई, जिससे विवाद खड़ा हुआ। ग्रामीणों ने शिक्षा विभाग से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाए तो संबंधित शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
हालांकि, स्कूल प्रबंधन की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि तस्वीर किसी धर्म विशेष के प्रचार के उद्देश्य से नहीं लगाई गई थी। स्कूल से जुड़े लोगों का कहना है कि यह एक सामान्य प्रेरणादायक चित्र के रूप में लगाया गया था, लेकिन स्थानीय लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचने के बाद इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया। प्रबंधन का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी भी धर्म की भावना को आहत करना नहीं था और न ही किसी तरह का धार्मिक प्रचार किया गया।
इस घटना ने एक बार फिर सरकारी स्कूलों में धर्म और शिक्षा के बीच की सीमा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां सरकार और सरकारी संस्थानों को किसी भी धर्म के प्रति झुकाव नहीं दिखाना चाहिए। सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को समानता, भाईचारे और संविधानिक मूल्यों की शिक्षा देना होता है। ऐसे में किसी एक धर्म से जुड़े प्रतीकों का प्रदर्शन विवाद का कारण बन सकता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूलों में राष्ट्रीय महापुरुषों, वैज्ञानिकों, समाज सुधारकों और संविधान से जुड़े प्रतीकों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि बच्चों में देशभक्ति, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक समरसता का विकास हो। धार्मिक प्रतीकों को लेकर विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है, क्योंकि समाज विविधताओं से भरा हुआ है और छोटी सी चूक बड़ा विवाद खड़ा कर सकती है।
फिलहाल इस मामले की जानकारी शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन तक पहुंच चुकी है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच की जाएगी और यह देखा जाएगा कि क्या किसी नियम या दिशा-निर्देश का उल्लंघन हुआ है। जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। वहीं, ग्रामीणों की मांग है कि स्कूलों में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और शिक्षा व्यवस्था को विवादों से दूर रखा जाए।
कुल मिलाकर, स्कूल में यीशु मसीह की तस्वीर लगाए जाने का मामला अब केवल एक तस्वीर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह धर्मनिरपेक्षता, शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर विषय बन गया है। आने वाले दिनों में जांच के बाद यह स्पष्ट होगा कि यह लापरवाही थी या जानबूझकर लिया गया निर्णय, लेकिन इस घटना ने यह जरूर दिखा दिया है कि शिक्षा से जुड़े हर फैसले में सामाजिक संतुलन और संवैधानिक मूल्यों का ध्यान रखना कितना जरूरी है।

