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दंतेवाड़ा में खनन विरोध: चेतावनी के शब्द या विफल होती व्यवस्था का आईना?

दंतेवाड़ा में खनन के विरोध के दौरान एक युवक के खुले मंच से दिए गए बयान ने पूरे बस्तर को झकझोर दिया है। “तलवार और बंदूक उठाने में एक दिन नहीं लगेगा”, जैसे शब्द केवल गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि यह उस गहरी बेचैनी का संकेत हैं जो आदिवासी समाज के भीतर पनप रही है। यह बयान इसलिए भी गंभीर है क्योंकि बस्तर वह क्षेत्र है जहां एक ओर नक्सली संगठन हथियार डालने और मुख्यधारा में लौटने की बातें कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सामान्य आदिवासी युवा खुद को फिर से हथियार के मुहाने पर खड़ा महसूस कर रहा है।

यह विरोध सिर्फ खनन परियोजनाओं के खिलाफ नहीं है, बल्कि दशकों से चले आ रहे अविश्वास, उपेक्षा और संवादहीनता का विस्फोट है। जब युवक यह कहता है कि “हमारे दादा लोगों का समर्पण सिर्फ नाम के लिए था”, तो वह राज्य और व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करता है। क्या वाकई शांति की कोशिशें ज़मीन पर भरोसा पैदा कर पाई हैं? या फिर विकास की योजनाएं आदिवासियों के लिए डर और विस्थापन का दूसरा नाम बन गई हैं?

सरकार और प्रशासन के लिए यह एक चेतावनी है। खनन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ग्रामसभा की सहमति, पर्यावरणीय प्रभाव का ईमानदार आकलन और स्थानीय लोगों की भागीदारी सिर्फ कागजी औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। यदि पढ़ा-लिखा, आईटीआई किया हुआ युवा भी खुले मंच से जेल जाने की बात कहते हुए हथियार उठाने की चेतावनी दे रहा है, तो यह साफ है कि संवाद की सारी खिड़कियां बंद होती जा रही हैं।

यह भी उतना ही सच है कि हिंसा की धमकी किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन को कमजोर करती है। बस्तर ने बंदूक की कीमत बहुत महंगी चुकाई है—आदिवासी समाज ने, सुरक्षाबलों ने और पूरे क्षेत्र ने। ऐसे में अगर खनन विरोध का आंदोलन हिंसक भाषा की ओर मुड़ता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उसी आदिवासी समाज को होगा, जिसके अधिकारों की बात की जा रही है।

दंतेवाड़ा की स्थिति आज एक चौराहे पर खड़ी है। एक रास्ता संवाद, विश्वास और संवैधानिक अधिकारों का है; दूसरा रास्ता टकराव, भय और पुराने घावों को फिर से हरा करने का। सरकार को यह समझना होगा कि विकास का मतलब केवल खनिज निकालना नहीं, बल्कि उस जमीन पर रहने वालों की सहमति और सम्मान भी है। और आंदोलनरत नेतृत्व को भी यह तय करना होगा कि विरोध की आवाज लोकतंत्र में गूंजे या बारूद की गंध में खो जाए।

यह वक्त चेतावनी को नजरअंदाज करने का नहीं, बल्कि उसे समझने और हालात संभालने का है—क्योंकि बस्तर में अगर भरोसा टूटा, तो कीमत सिर्फ सरकार नहीं, पूरा समाज चुकाएगा।

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