छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से सटे सिड़मुड़ गांव की ग्रामसभा ने धर्मांतरण के बढ़ते आरोपों के बीच एक चौंकाने वाला निर्णय लिया है — गांव में बाहरी पादरियों और ईसाई धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध। यह प्रस्ताव लगभग 275 परिवारों के समर्थन से पारित किया गया, जिससे यह सिर्फ स्थानीय फैसला नहीं रह गया, बल्कि जातीय-सांस्कृतिक और संवैधानिक विमर्श का मुद्दा बन गया है।
ग्रामवासियों का कहना है कि पिछले दशक में बाहरी धर्म प्रचारकों की आने-जाने से धर्मांतरण के मामलों में बढ़ोतरी हुई है और इससे उनका सामाजिक ताना-बाना कमजोर हुआ है। इसलिए गाँव की “एकता और सामाजिक शांति” के लिए यह कदम जरूरी था, ऐसा ग्राम प्रतिनिधियों का कहना है। यह भावना उन आदिवासी समुदायों के व्यापक डर और असुरक्षा का प्रतीक है, जो अपनी रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए संवेदनशील रहते हैं।
हालांकि, इस तरह के निर्णय ने संवैधानिक और कानूनी चुनौतियों को भी जन्म दिया है। भारत के संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसमें यह अधिकार शामिल है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म का प्रचार कर सकता है और किसी भी धार्मिक विश्वास को अपना सकता है। ऐसे में पादरियों के प्रवेश पर कुल प्रतिबंध लगाना अधिकारों का उल्लंघन प्रतीत हो सकता है और यह “धार्मिक स्वतंत्रता” के मूल सिद्धांत को चुनौती देता है।
कुछ मामलों में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि धर्मांतरण रोकने के नाम पर कोई भी प्रतिबंध आत्मस्वीकृत नहीं होना चाहिए और यदि समुदाय को असुरक्षा का भय है, तो उसे वैधानिक उपायों का सहारा लेना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रलोभन या धोखे से धर्मांतरण रोकने के कदम को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता, पर यह संतुलन बनाकर अपनाया जाना चाहिए।
यह मामला उस व्यापक बहस का हिस्सा है जो पूरे प्रदेश और देश में धर्मांतरण, सांस्कृतिक पहचान और समुदाय की अस्मिता पर उभर रही है। कुछ राज्यों में सरकारें धर्मांतरण रोकने वाले कड़े कानून भी बना रही हैं, जिनमें प्रशासनिक अनुमति, पूर्व सूचना और दोषी पाए जाने पर कठोर दंड जैसे प्रावधान शामिल हैं।
परिणामतः, गाँव की सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण की भावना और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन खोजना हमारा प्रमुख दायित्व होना चाहिए। धार्मिक प्रचार से जुड़े किसी भी फैसले को समाज के समग्र हित, लोकतंत्र की मूल्यों और बुनियादी अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाना चाहिए — न कि भय और असहमति के नाम पर। इस तरह के निर्णयों को केवल सांप्रदायिक प्रतिक्रिया के रूप में देखने के बजाय, हमें संविधान और सामाजिक सद्भाव के दृष्टिकोण से गंभीरता से परीक्षण करना चाहिए।

