परीक्षा पे चर्चा 2026’ में छत्तीसगढ़ का अभिभावक सहभागिता के मामले में देश में प्रथम स्थान पर पहुँचना शिक्षा जगत के लिए एक सकारात्मक संकेत है। यह उपलब्धि केवल पंजीकरण के आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि राज्य में परीक्षा और शिक्षा को लेकर सोच में व्यापक बदलाव आ रहा है।
वर्षों से भारतीय शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा को डर और दबाव से जोड़कर देखा जाता रहा है। अंकों की होड़ और अपेक्षाओं का बोझ अक्सर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता है। ऐसे माहौल में ‘परीक्षा पे चर्चा’ जैसे संवादात्मक कार्यक्रम तनाव को कम करने की दिशा में सार्थक पहल साबित हो रहे हैं।
इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें केवल छात्र ही नहीं, बल्कि अभिभावक और शिक्षक भी सक्रिय रूप से शामिल होते हैं। छत्तीसगढ़ में माता-पिता की रिकॉर्ड भागीदारी इस बात का संकेत है कि अब वे बच्चों की भावनात्मक जरूरतों को समझने लगे हैं और परीक्षा को जीवन का अंतिम पैमाना नहीं मानते।
राज्य सरकार और शिक्षा विभाग द्वारा चलाए गए संगठित अभियान भी इस सफलता के पीछे अहम रहे हैं। स्कूलों, कॉलेजों और जिला स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से अभिभावकों को जोड़ा गया, जिससे सहभागिता लगातार बढ़ती गई।
यह बदलाव केवल प्रशासनिक प्रयासों का परिणाम नहीं है, बल्कि समाज की मानसिकता में आए परिवर्तन को भी दर्शाता है। अब परिवार यह समझने लगे हैं कि बच्चों की सफलता का रास्ता दबाव नहीं, बल्कि सहयोग और समझ से होकर जाता है।
हालांकि, यह भी सच है कि एक कार्यक्रम से शिक्षा व्यवस्था की सभी चुनौतियाँ समाप्त नहीं हो सकतीं। परीक्षा प्रणाली में सुधार, पाठ्यक्रम का संतुलन और रचनात्मक शिक्षा को बढ़ावा देना अभी भी जरूरी है।
इसके साथ-साथ स्कूलों में नियमित काउंसलिंग व्यवस्था, शिक्षकों का संवेदनशील प्रशिक्षण और मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत को प्राथमिकता देना समय की मांग है। तभी परीक्षा का तनाव वास्तव में कम किया जा सकेगा।
छत्तीसगढ़ की यह उपलब्धि देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत है। यदि हर राज्य इसी तरह अभिभावकों को शिक्षा संवाद का हिस्सा बनाए, तो राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक बदलाव संभव है।
शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया है। ‘परीक्षा पे चर्चा’ ने इस मूल भावना को दोबारा सामने लाने का काम किया है, जहाँ बच्चे खुद को सुना हुआ और समझा हुआ महसूस करते हैं।
अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ ने यह साबित कर दिया है कि जब छात्र, अभिभावक और शिक्षक एक मंच पर संवाद करते हैं, तभी शिक्षा वास्तव में सशक्त बनती है। परीक्षा का डर कम होकर आत्मविश्वास में बदले—यही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता है।

