छत्तीसगढ़ में रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें सुपर बिल्ट-अप एरिया के आधार पर संपत्तियों की रजिस्ट्री किए जाने को गैरकानूनी बताया गया है। यह मामला सीधे तौर पर Chhattisgarh Real Estate Regulatory Authority (सीजी रेरा) के नियमों और उनके क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है। खबर के मुताबिक राज्य में कई बिल्डर अब भी सुपर बिल्ट-अप एरिया के आधार पर फ्लैट और मकानों की बिक्री और रजिस्ट्री कर रहे हैं, जबकि कानून स्पष्ट रूप से कार्पेट एरिया को ही वैध आधार मानता है।
क्या है पूरा मामला?
रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 लागू होने के बाद देशभर में यह अनिवार्य कर दिया गया था कि किसी भी आवासीय या व्यावसायिक संपत्ति की बिक्री, बुकिंग और रजिस्ट्री केवल “कार्पेट एरिया” के आधार पर ही होगी। कार्पेट एरिया का अर्थ है वह वास्तविक क्षेत्रफल, जिसका उपयोग मकान मालिक अपने निजी उपयोग के लिए कर सकता है—जैसे कमरे, रसोई, बाथरूम आदि। इसमें दीवारों के अंदर का हिस्सा शामिल होता है, लेकिन कॉमन एरिया नहीं।
इसके विपरीत, “सुपर बिल्ट-अप एरिया” में कार्पेट एरिया के अलावा सीढ़ियाँ, लिफ्ट, कॉरिडोर, लॉबी, बालकनी और अन्य साझा सुविधाओं का अनुपात भी जोड़ दिया जाता है। इस वजह से सुपर बिल्ट-अप एरिया, कार्पेट एरिया से काफी अधिक दिखाई देता है। यही वह बिंदु है जहां उपभोक्ता भ्रमित हो जाते हैं।
कैसे होता है उपभोक्ताओं के साथ खेल?
खबर के अनुसार कई बिल्डर अपने विज्ञापनों और ब्रोशर में सुपर बिल्ट-अप एरिया को प्रमुखता से दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, किसी फ्लैट को 1800 वर्गफुट बताकर बेचा जाता है, जबकि उसका वास्तविक कार्पेट एरिया मात्र 1300 या 1400 वर्गफुट ही होता है। ग्राहक को यह अंतर अक्सर समझ में नहीं आता और वह बड़े क्षेत्रफल के भ्रम में अधिक कीमत चुका देता है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि कई मामलों में रजिस्ट्री भी सुपर बिल्ट-अप एरिया के आधार पर कर दी जाती है। जबकि कानून के अनुसार यह स्पष्ट रूप से अवैध है। रजिस्ट्री दस्तावेज में केवल कार्पेट एरिया का उल्लेख होना चाहिए। यदि रजिस्ट्री में सुपर बिल्ट-अप एरिया दर्ज किया जाता है, तो यह नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।
रेरा की भूमिका पर सवाल
राज्य में रियल एस्टेट परियोजनाओं की निगरानी और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी सीजी रेरा की है। लेकिन खबर में यह सवाल उठाया गया है कि जब नियम इतने स्पष्ट हैं, तब भी सुपर बिल्ट-अप के आधार पर रजिस्ट्री कैसे हो रही है? क्या रजिस्ट्रार कार्यालय इस पर ध्यान नहीं दे रहे? या फिर निगरानी तंत्र में ढिलाई है?
रेरा का मूल उद्देश्य पारदर्शिता लाना और बिल्डरों की मनमानी पर रोक लगाना था। इसके बावजूद यदि बिल्डर पुराने तरीके से ही बिक्री कर रहे हैं, तो यह नियामक व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
कानूनी और आर्थिक प्रभाव
सुपर बिल्ट-अप एरिया के आधार पर बिक्री और रजिस्ट्री से उपभोक्ता को दोहरा नुकसान होता है। पहला, वह अधिक कीमत चुकाता है। दूसरा, भविष्य में यदि वह संपत्ति बेचता है या किसी कानूनी विवाद में उलझता है, तो उसे वास्तविक क्षेत्रफल के आधार पर ही मूल्यांकन का सामना करना पड़ सकता है।
इसके अलावा, बैंक लोन और बीमा से जुड़े मामलों में भी कार्पेट एरिया ही महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में दस्तावेजों में अंतर होने से विवाद की स्थिति बन सकती है।
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे पहले रजिस्ट्री कार्यालयों को सख्ती से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी दस्तावेज में सुपर बिल्ट-अप एरिया के आधार पर पंजीयन न हो। सभी प्रोजेक्ट्स की जानकारी और स्वीकृत नक्शे सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि खरीदार स्वयं जांच कर सकें।
इसके अलावा उपभोक्ताओं को भी जागरूक होने की आवश्यकता है। फ्लैट खरीदते समय उन्हें स्पष्ट रूप से कार्पेट एरिया पूछना चाहिए और अनुबंध में उसी का उल्लेख सुनिश्चित करना चाहिए। यदि कोई बिल्डर सुपर बिल्ट-अप के आधार पर रजिस्ट्री का दबाव डालता है, तो उपभोक्ता रेरा में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में सुपर बिल्ट-अप एरिया के आधार पर हो रही रजिस्ट्री का मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। कानून स्पष्ट है कि बिक्री और रजिस्ट्री केवल कार्पेट एरिया के आधार पर होनी चाहिए। यदि इसके बावजूद नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो संबंधित अधिकारियों और नियामक संस्था को कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। अन्यथा आम नागरिक अपनी जीवनभर की कमाई से घर खरीदने के बाद भी ठगा हुआ महसूस करता रहेगा।

