जगदलपुर।जिला कलेक्टर परिसर में स्थित पालना केंद्र को लेकर एक मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक महिला को अपने रोते हुए शिशु को दूध पिलाने के लिए अंदर जाने से रोक दिया गया।
जानकारी के अनुसार, महिला किसी काम से कलेक्टर कार्यालय पहुंची थी। उसके साथ उसका छोटा बच्चा भी था। कुछ देर बाद बच्चा रोने लगा। मां ने बच्चे को शांत कराने और दूध पिलाने के लिए परिसर में संचालित पालना केंद्र की ओर रुख किया। लेकिन वहां मौजूद कर्मचारियों ने उसे यह कहकर रोक दिया कि यह सुविधा केवल कलेक्टर परिसर में कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों के लिए है।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि महिला ने केवल कुछ मिनट के लिए अंदर बैठकर बच्चे को दूध पिलाने की बात कही थी, लेकिन उसे अनुमति नहीं दी गई। इस दौरान कथित तौर पर कहा गया कि “यह सुविधा बाहरी लोगों के लिए नहीं है।”
घटना के बाद वहां मौजूद लोगों में चर्चा शुरू हो गई। सवाल उठ रहा है कि क्या किसी मां को अपने शिशु को दूध पिलाने से रोका जा सकता है? खासकर तब, जब बच्चा रो रहा हो और मां को सिर्फ कुछ समय के लिए जगह की जरूरत हो।
नियम बनाम मानवीय संवेदनशीलता
कलेक्टर परिसर में संचालित पालना केंद्र महिला एवं बाल विकास विभाग के अंतर्गत चलता है। संभव है कि यह सुविधा केवल कर्मचारियों के बच्चों के लिए निर्धारित हो। लेकिन यहां मामला नियमित उपयोग का नहीं, बल्कि एक तत्काल आवश्यकता का था।
कानून के जानकारों का कहना है कि सार्वजनिक स्थान पर स्तनपान कराना कोई अपराध नहीं है। यह मां और बच्चे का प्राकृतिक अधिकार है। ऐसे में कम से कम मानवीय आधार पर कुछ मिनट की अनुमति दी जा सकती थी।
क्या परिसर में वैकल्पिक व्यवस्था है?
यह भी सवाल उठ रहा है कि जिला मुख्यालय जैसे महत्वपूर्ण कार्यालय में महिलाओं के लिए अलग से स्तनपान कक्ष या विश्राम कक्ष की व्यवस्था है या नहीं। प्रतिदिन बड़ी संख्या में महिलाएं विभिन्न कार्यों से यहां आती हैं। यदि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, तो यह गंभीर कमी मानी जा सकती है।
सामाजिक नजरिया भी जिम्मेदार
अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान को लेकर अनावश्यक संकोच या आपत्ति देखी जाती है। जबकि चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, शिशु के लिए स्तनपान बेहद जरूरी है। बच्चा जब भूखा हो, तो उसे तुरंत दूध मिलना चाहिए।
घटना के बाद कई लोगों का कहना है कि नियम अपनी जगह हैं, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है। यदि कोई महिला कुछ मिनट के लिए बच्चे को दूध पिलाना चाहती है, तो उसे रोकना उचित नहीं माना जा सकता।
प्रशासन से अपेक्षा
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले को किस तरह लेता है। क्या इस संबंध में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे? क्या भविष्य में ऐसी स्थिति आने पर मानवीय आधार पर निर्णय लिया जाएगा?
यह मामला केवल एक महिला का नहीं है। यह उन सभी महिलाओं का प्रश्न है जो अपने छोटे बच्चों के साथ सरकारी कार्यालयों में आती हैं। यदि सार्वजनिक परिसरों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी, तो परेशानी बढ़ना स्वाभाविक है।
फिलहाल यह घटना शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रशासन की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
जिला मुख्यालय में स्तनपान पर रोक? प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल

