माओवादी संगठन के भीतर संजीव, चेतन, सुदर्शन और रमेश जैसे कई छद्म नामों से सक्रिय रहे ‘देवजी’ को सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से संगठन की रणनीतिक कड़ी मानती रही हैं। अलग-अलग नामों के पीछे छिपा यह चेहरा सिर्फ एक फील्ड कमांडर नहीं, बल्कि नीति-निर्धारण और सैन्य ढांचे को दिशा देने वाले प्रमुख लोगों में शामिल बताया जाता है। संगठन के पूर्व सदस्यों और सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, देवजी ने माओवादी संरचना को मजबूत करने, प्रशिक्षण तंत्र विकसित करने और बड़े अभियानों की रणनीति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2004 के बाद उभार
सूत्रों के मुताबिक, वर्ष 2004 में पीपुल्स वॉर ग्रुप के माओवादी धड़े में शामिल होने के बाद भी देवजी संगठन की शीर्ष निर्णयकारी इकाइयों—केंद्रीय समिति और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन—में सक्रिय रहे। 2004 का दौर भारतीय माओवादी आंदोलन के लिए पुनर्गठन और विस्तार का समय माना जाता है। इसी चरण में संगठन ने अपनी सैन्य और राजनीतिक रणनीति को नए सिरे से परिभाषित किया।
बताया जाता है कि देवजी ने इस पुनर्गठन के दौरान न केवल जमीनी नेटवर्क को मजबूत किया, बल्कि क्षेत्रीय इकाइयों के बीच समन्वय स्थापित करने में भी भूमिका निभाई। संगठन के भीतर उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्ति की थी, जो रणनीतिक सोच और परिचालन क्षमता दोनों में संतुलन रखता था।
केंद्रीय मिलिट्री कमीशन में प्रभाव
जानकारी के अनुसार, जब बसवराजू सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के प्रमुख थे, तब देवजी ने सैन्य रणनीतियों के क्रियान्वयन और प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2018 में बसवराजू के केंद्रीय समिति के महासचिव बनने के बाद सेंट्रल मिलिट्री कमीशन की कमान भी उनके हाथों में आई। इस दौरान संगठन ने अपने गुरिल्ला तंत्र को अधिक संगठित और बहुस्तरीय बनाने की कोशिश की।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस चरण में माओवादी ढांचे ने छोटे-छोटे मोबाइल दस्तों के गठन, स्थानीय कैडर की भर्ती और हथियार प्रबंधन की रणनीति को सुदृढ़ किया। आरोप है कि देवजी इस प्रक्रिया के संचालन और निगरानी में शामिल थे। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अलग-अलग मामलों में भिन्न रही है।
छत्तीसगढ़: संघर्ष का केंद्र
छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर क्षेत्र, लंबे समय से माओवादी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। सुरक्षा बलों पर हुए कई बड़े हमलों के पीछे जिन नामों की चर्चा होती रही, उनमें देवजी का नाम भी शामिल रहा है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, वे उन समूहों का हिस्सा थे जो रणनीतिक स्तर पर हमलों की योजना बनाते थे।
हालांकि प्रत्यक्ष भूमिका के हर आरोप की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन एजेंसियों का मानना है कि देवजी क्षेत्रीय कमांडरों के साथ समन्वय स्थापित कर परिचालन संबंधी दिशा-निर्देश देने में सक्रिय थे। गुरिल्ला युद्धनीति के तहत छोटे दस्तों द्वारा किए जाने वाले हमलों, एंबुश और आईईडी आधारित रणनीतियों को लागू करने में संगठन ने जिस तरह की संरचना विकसित की, उसमें उनकी भूमिका की चर्चा होती रही है।
पीएलजीए के गठन और विस्तार में भूमिका
संगठन के करीबी पर्यवेक्षकों का कहना है कि पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) को व्यवस्थित ढांचे में ढालने में देवजी का योगदान रहा। पीएलजीए को माओवादी संगठन की सशस्त्र इकाई माना जाता है, जो गुरिल्ला युद्ध के सिद्धांतों पर संचालित होती है।
बताया जाता है कि देवजी ने प्रशिक्षण शिविरों की संरचना, कैडर की क्षमताओं के आकलन और हथियारों के उपयोग की रणनीति पर काम किया। संगठन ने स्थानीय युवाओं को शामिल कर उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देने की जो प्रक्रिया विकसित की, उसमें भी उनकी भागीदारी की बात कही जाती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पीएलजीए का ढांचा केवल हथियारबंद संघर्ष तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें खुफिया संग्रह, रसद प्रबंधन और संचार तंत्र भी शामिल था। इस बहुस्तरीय संरचना को विकसित करने में जिन नामों की चर्चा होती है, उनमें देवजी का नाम प्रमुखता से सामने आता है।
कई नामों के पीछे रणनीति
माओवादी संगठन में छद्म नामों का इस्तेमाल नई बात नहीं है। सुरक्षा से बचने, पहचान छिपाने और अलग-अलग क्षेत्रों में स्वतंत्र भूमिका निभाने के लिए कार्यकर्ता कई नामों से काम करते हैं। देवजी द्वारा संजीव, चेतन, सुदर्शन और रमेश जैसे नामों का उपयोग इसी रणनीति का हिस्सा माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अलग-अलग नामों से सक्रिय रहने से न केवल सुरक्षा एजेंसियों को भ्रमित किया जा सकता है, बल्कि संगठन के भीतर भी कार्य विभाजन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे एक व्यक्ति अलग-अलग जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी प्रत्यक्ष पहचान से दूर रह सकता है।
एनआईए की वांछित सूची में
देवजी का नाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की वांछित सूची में शामिल बताया जाता है। एनआईए और अन्य सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से माओवादी नेटवर्क को तोड़ने के लिए अभियान चला रही हैं। एजेंसियों का मानना है कि शीर्ष स्तर पर मौजूद रणनीतिक चेहरों की गिरफ्तारी से संगठन की संरचना को कमजोर किया जा सकता है।
हालांकि, माओवादी ढांचा वर्षों से विकेंद्रीकृत प्रणाली पर काम करता रहा है, जहां क्षेत्रीय इकाइयों को पर्याप्त स्वायत्तता दी जाती है। ऐसे में किसी एक चेहरे की गिरफ्तारी या निष्क्रियता से संगठन पर कितना प्रभाव पड़ेगा, यह विश्लेषण का विषय है।
भविष्य की दिशा
देवजी जैसे नाम माओवादी संगठन की उस परत को उजागर करते हैं, जहां रणनीति, प्रशिक्षण और परिचालन योजना का जटिल तंत्र काम करता है। सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती केवल व्यक्तियों को पकड़ना नहीं, बल्कि उस नेटवर्क को समझना और तोड़ना भी है जो वर्षों में विकसित हुआ है।
छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में जारी सुरक्षा अभियानों के बीच यह सवाल भी उठता है कि क्या शीर्ष स्तर के रणनीतिक चेहरों के निष्क्रिय होने से जमीनी स्तर पर हिंसा में कमी आएगी, या संगठन नए नेतृत्व के साथ खुद को फिर से संगठित कर लेगा।
कई नामों और भूमिकाओं के पीछे सक्रिय रहा देवजी माओवादी संगठन के सैन्य और रणनीतिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता रहा है। आरोपों और दावों के बीच उनकी भूमिका को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि वे संगठन के उच्च स्तर पर प्रभावशाली रहे।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई और बदलते हालात माओवादी ढांचे को किस दिशा में ले जाते हैं। क्या यह नेटवर्क कमजोर होगा, या अपनी रणनीति बदलकर नए सिरे से उभरेगा—यह आने वाला समय ही बताएगा।
कई नाम, एक चेहरा: माओवादी ढांचे का रणनीतिक किरदार ‘देवजी’

