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कानून के पहरेदार पर हमला, व्यवस्था पर गहरा धब्बा

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में खदान विरोध प्रदर्शन के दौरान एक महिला पुलिसकर्मी के साथ हुई बर्बरता केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था, भीड़तंत्र और प्रशासनिक तैयारी पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

वायरल हुए वीडियो ने समाज को झकझोर दिया है, जिसमें देखा जा सकता है कि किस तरह भीड़ ने एक महिला सिपाही को घेरकर उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया। यह दृश्य किसी सभ्य लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं हो सकता।


विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जब विरोध हिंसा में बदल जाए और कानून की रक्षक ही असुरक्षित हो जाए, तब यह आंदोलन नहीं बल्कि अराजकता कहलाता है। यह घटना बताती है कि भीड़ को यह भरोसा हो चला है कि कानून उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा। यही सोच सबसे खतरनाक है, क्योंकि यही सोच राज्य को अराजकता की ओर ले जाती है।


सवाल यह भी है कि इतने संवेदनशील क्षेत्र में, जहां पहले से तनाव की आशंका थी, पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए गए? क्या प्रशासन ने हालात को हल्के में लिया? महिला सिपाही के साथ हुई बदसलूकी महिला सुरक्षा के तमाम दावों की पोल खोल देती है। जब वर्दी में खड़ी महिला सुरक्षित नहीं, तो आम महिला की स्थिति का अनुमान लगाना कठिन नहीं।


यह घटना केवल पुलिस पर हमला नहीं है, बल्कि राज्य की संप्रभुता और कानून के राज पर सीधा हमला है। यदि इसे सख्ती से नहीं रोका गया, तो भविष्य में ऐसे हमले आम हो जाएंगे। पुलिस द्वारा दो आरोपियों की गिरफ्तारी एक शुरुआती कदम है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं। जब तक हर दोषी को सजा नहीं मिलती, तब तक न्याय अधूरा रहेगा।


राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का आना स्वाभाविक है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मामला भी कुछ दिनों की बयानबाजी के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? खनन परियोजनाओं को लेकर स्थानीय असंतोष एक वास्तविक मुद्दा है, लेकिन असंतोष को हिंसा में बदलने की अनुमति किसी भी हालत में नहीं दी जा सकती।


प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह संवाद, पारदर्शिता और संवेदनशीलता से जनता की चिंताओं को सुने, ताकि हालात विस्फोटक न हों। इस घटना ने पुलिस बल के मनोबल को भी आघात पहुंचाया है। जब जवान यह महसूस करें कि ड्यूटी करते समय उनकी जान और सम्मान दोनों खतरे में हैं, तो व्यवस्था कमजोर होती है।


महिला पुलिसकर्मी के साथ हुई इस घटना को उदाहरण बनाकर कड़ी सजा दी जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि कानून हाथ में लेने की कीमत भारी होगी। समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि विरोध की आड़ में हिंसा को जायज़ ठहराने की प्रवृत्ति कितनी खतरनाक है।


अंततः यह मामला केवल एक जिले या राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है कि यदि कानून का सम्मान नहीं बचा, तो लोकतंत्र केवल कागजों में सिमट कर रह जाएगा।

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