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सत्ता की भाषा और लोकतंत्र की मर्यादा

’पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बयानबाज़ी के ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ शब्द सिर्फ शब्द नहीं रह जाते, बल्कि सत्ता के अहंकार और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कसौटी बन जाते हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह कहना कि “अगर चाहती तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को होटल से बाहर नहीं निकलने देती”—एक सामान्य राजनीतिक तंज नहीं, बल्कि सत्ता की भाषा में छुपी एक गंभीर चेतावनी जैसा प्रतीत होता है।

लोकतंत्र में असहमति, विरोध और तीखी आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन जब संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ऐसे वक्तव्य दें, जो शक्ति-प्रदर्शन या दबाव का संकेत दें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या सत्ता अब संवाद की जगह धमकी की भाषा बोलने लगी है?

भाजपा ने इस बयान को केवल अपने नेता पर हमला नहीं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा और संघीय ढांचे पर चोट बताया है। इसमें अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन यह सच है कि यदि कोई राज्य का मुखिया यह जताने लगे कि वह केंद्रीय गृहमंत्री की आवाजाही रोक सकता है, तो यह संघीय व्यवस्था के संतुलन पर सीधा प्रश्न खड़ा करता है।

दूसरी ओर, ममता बनर्जी का पलटवार भी कम आक्रामक नहीं रहा। भाजपा नेताओं की तुलना महाभारत के दुर्योधन-दुशासन से करना राजनीतिक प्रतीकवाद का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इससे राजनीति का स्तर और नीचे ही जाता है। आरोपों और प्रतीकों की इस लड़ाई में असल मुद्दे—राज्य में हिंसा, प्रशासनिक निष्पक्षता, सीमा सुरक्षा और आम जनता की समस्याएं—हाशिये पर चली जाती हैं।

यह पूरा विवाद 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले की रणनीतिक गर्माहट का संकेत है। दोनों दल अपने-अपने वोट बैंक को संदेश दे रहे हैं—एक तरफ ‘बाहरी हस्तक्षेप’ का नैरेटिव, दूसरी तरफ ‘कानून-व्यवस्था और राष्ट्र की सुरक्षा’ का दावा।

लेकिन सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र सिर्फ चुनावी गणित तक सिमट गया है? क्या संवैधानिक पद अब भाषाई संयम के दायरे से बाहर हो चुके हैं?

देश को ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत है जो ताकत दिखाने की नहीं, बल्कि भरोसा जगाने की भाषा बोले। वरना राजनीति की यह तल्ख़ी धीरे-धीरे लोकतंत्र की जड़ों को ही खोखला कर देगी।

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