जगदलपुर। धरमपुरा–कंगोली भूमि शिफ्टिंग विवाद के बीच अब एक नया और बेहद गंभीर पहलू सामने आया है। जिस मामले में पहले से राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर, भूमि को दूसरी जगह “शिफ्ट” दिखाने और करोड़ों की जमीन पर कब्जे की कोशिश जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं, उसी विवाद से जुड़े नाम अविनाश दानी का अब जमीन बिक्री प्रचार से जुड़ा स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है।
सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप स्टेटस पर सामने आए एक वीडियो स्क्रीनशॉट में साफ तौर पर “Plot for sale Near By MGM Dharampura Jagdalpur” लिखा दिखाई दे रहा है। स्टेटस में एक बड़े भूखंड का वीडियो साझा किया गया है, जिसने पूरे मामले को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
सबसे बड़ा सवाल अब यह उठ रहा है कि आखिर एक शासकीय शिक्षक का लगातार जमीन बिक्री और प्रॉपर्टी प्रचार से क्या संबंध है? स्थानीय लोगों का कहना है कि शिक्षा विभाग में पदस्थ रहते हुए यदि कोई कर्मचारी खुले तौर पर प्लॉट बिक्री और जमीन नेटवर्किंग में सक्रिय दिखाई देता है, तो यह नैतिक और प्रशासनिक दोनों स्तर पर गंभीर विषय बन जाता है।
धरमपुरा–कंगोली क्षेत्र में पहले से खसरा नंबर 18/7 को लेकर विवाद चल रहा है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि राजस्व अभिलेखों में फेरबदल कर जमीन की वास्तविक स्थिति बदलने की कोशिश की जा रही है । इसी मामले में अवैध कब्जा प्रयास और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। अब उसी विवाद के बीच जमीन बिक्री से जुड़े प्रचार ने लोगों के संदेह और गहरे कर दिए हैं।
स्थानीय लोगो का कहना है कि यह मामला केवल व्यक्तिगत जमीन लेनदेन का नहीं दिखता, बल्कि इसके पीछे एक बड़े जमीन नेटवर्क और आर्थिक हितों की संभावना नजर आ रही है। लोगों का आरोप है कि सोशल मीडिया और मोबाइल स्टेटस के जरिए जमीनों का प्रचार कर प्रभाव बढ़ाने और खरीदारों तक पहुंच बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
मामला इसलिए भी संवेदनशील हो गया है क्योंकि पूर्व में राजस्व विभाग की जांच में भूमि को उसकी मूल स्थिति में बताया गया था और कब्जा प्रयास को विवादित माना गया था। इसके बावजूद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी। अब जब जमीन बिक्री प्रचार सामने आया है, तो लोग पूछ रहे हैं कि क्या जांच को जानबूझकर धीमा किया गया?
शहर के प्रबुद्धजनों के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यदि कोई शासकीय कर्मचारी नियमित रूप से जमीन बिक्री से जुड़े प्रचार में सक्रिय है, तो क्या इसकी जानकारी संबंधित विभाग को है? और यदि है, तो अब तक कोई विभागीय जांच या कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
सरकारी सेवा में रहते हुए निजी भूमि कारोबार में सक्रिय भूमिका हितों के टकराव की स्थिति पैदा कर सकती है। खासकर तब, जब उसी व्यक्ति का नाम पहले से विवादित भूमि मामले और रिकॉर्ड हेरफेर के आरोपों में सामने आ चुका हो।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे स्टेटस के बाद अब यह मांग उठने लगी है कि प्रशासन इस पूरे मामले की वित्तीय और राजस्व स्तर पर भी जांच कराए। लोगों का कहना है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि आखिर जिन जमीनों का प्रचार किया जा रहा है, उनका वास्तविक रिकॉर्ड क्या है और कहीं उनका संबंध विवादित भूमि से तो नहीं।
हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वायरल स्टेटस में दिखाई गई जमीन सीधे तौर पर उसी विवादित खसरा नंबर 18/7 से जुड़ी है या नहीं। इस संबंध में संबंधित पक्ष की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन लगातार सामने आ रहे तथ्यों ने पूरे प्रकरण को और अधिक गंभीर बना दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है… क्या प्रशासन वायरल स्टेटस, भूमि विवाद और राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े आरोपों को गंभीरता से लेकर जांच करेगा? या फिर करोड़ों की जमीन से जुड़ा यह पूरा मामला फाइलों और प्रभावशाली संपर्कों के बीच दबकर रह जाएगा?
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