जगदलपुर। धरमपुरा–कंगोली क्षेत्र की करोड़ों रुपए मूल्य की विवादित भूमि अब सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि संभावित राजस्व घोटाले और प्रशासनिक निष्क्रियता का गंभीर मामला बनती जा रही है। खसरा नंबर 18/7 को लेकर कलेक्टर बस्तर को सौंपे गए शिकायत आवेदन में राजस्व रिकॉर्ड से छेड़छाड़, भूमि को दूसरी जगह “शिफ्ट” दिखाने की साजिश, अवैध कब्जा प्रयास और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। हैरानी की बात यह है कि आवेदन एसडीएम कार्यालय और तहसीलदार तक पहुंचने के बावजूद महीनों बाद भी जांच फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई है।
शिकायत में सीधे तौर पर आरोप लगाया गया है कि ग्राम कंगोली स्थित भूमि को लेकर एमएलबी स्कूल के शिक्षक अविनाश दानी और उनके सहयोगियों द्वारा राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर जमीन की वास्तविक स्थिति बदलने का प्रयास किया जा रहा है। शिकायतकर्ता का दावा है कि पूरा खेल करोड़ों की जमीन पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से रचा गया।
मामला और गंभीर तब हो जाता है जब पूर्व जांच रिपोर्ट सामने आती है। शिकायत के अनुसार, पहले कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक कार्यालय में भी इस मामले की शिकायत की गई थी, जिसके बाद राजस्व निरीक्षक और तत्कालीन पटवारी की जांच में साफ कहा गया था कि भूमि अपनी मूल जगह पर ही स्थित है और उस पर किया जा रहा कब्जा प्रयास अवैध एवं विवादित प्रकृति का है। इसके बावजूद कार्रवाई का पहिया अचानक क्यों रुक गया, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

आरोप यह भी है कि विवादित भूमि मूल रूप से अविनाश दानी की पत्नी सलीमा दानी के नाम दर्ज है, लेकिन बाद में प्रभाव और संपर्कों के जरिए जमीन को दूसरी जगह दर्शाने की कोशिश शुरू हुई। शिकायतकर्ता का कहना है कि सीमांकन और दस्तावेजों में फेरबदल कर आसपास की दूसरी जमीनों को जोड़ने की तैयारी की जा रही थी, ताकि भविष्य में बड़ा आर्थिक लाभ लिया जा सके।
सबसे विस्फोटक आरोप राजस्व विभाग पर दबाव बनाने को लेकर सामने आया है। शिकायत में कहा गया है कि कुछ अधिकारियों पर रिकॉर्ड प्रभावित करने का दबाव डाला गया, लेकिन राजस्व निरीक्षक शत्रुघन बघेल और हल्का पटवारी द्वारा आपत्ति दर्ज किए जाने के कारण मामला दब नहीं सका। अब सवाल उठ रहा है कि जब विभागीय स्तर पर आपत्तियां दर्ज हो चुकी थीं, तब भी उच्च अधिकारियों ने मामले को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया?
आवेदन में तत्काल स्थल निरीक्षण, सीमांकन, उच्चस्तरीय जांच, अवैध कब्जा प्रयास करने वालों पर कार्रवाई, विवादित भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने और रिकॉर्ड में किसी भी प्रकार के परिवर्तन पर रोक लगाने जैसी मांगें की गई थीं। लेकिन महीनों बाद भी प्रशासनिक मशीनरी की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो भविष्य में यह मामला बड़े भूमि घोटाले और गंभीर विवाद का रूप ले सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है आखिर किसके दबाव में जांच आगे नहीं बढ़ रही? और करोड़ों की जमीन से जुड़े इतने गंभीर आरोपों पर प्रशासन मौन क्यों है?
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