नीतीश कुमार ने अपने जीवन में कितने लोगों को विधायक, सांसद और राज्य सभा का सदस्य बनाया होगा। मंत्री बनाया होगा और चेयरमैन बनाया होगा। आज कितने लोग नीतीश के लिए बोल सके। दो शब्द नीतीश के कार्यकाल पर ही बोलते और इस पर भी कि क्या नीतीश कुमार की इस तरह से विदाई होनी चाहिए थी? जो लोग नीतीश कुमार के सेहतमंद रहते हुए उनके साथ बिना हाथ जोड़े खड़े नहीं हो पाते होंगे, वो लोग आज चुप क्यों हो गए? क्या अब नीतीश उनके लिए कुछ नहीं हैं? आज क्यों नहीं उनकी पार्टी के नेता मीडिया के सामने आ सके औऱ बयान देते रहे। क्या वे नीतीश कुमार के काम की तारीफ भी नहीं कर सकते थे? इतना भय है?
नीतीश का ट्वीटर पोस्ट हैरान करने वाला है। लगता नहीं कि उनका लिखा हुआ ट्वीट है।अगर नीतीश कुमार इतना लंबा ट्वीट कर सकते हैं तो आज के दिन पटना के प्रेस से बात भी कर सकते थे। इसी से संदेह होता है कि नीतीश कुमार का ट्वीट किसी और का लिखा हुआ है। ट्वीट की भाषा ने नीतीश कुमार को और छोटा कर दिया। क्या सही में नीतीश कुमार इतनी छोटी सी चाहत के लिए राज्य सभा जा रहे हैं कि कभी राज्य सभा में नहीं रहे? विधान सभा और विधान मंडल के सदस्य रहे। लोकसभा के सदस्य रहे। राज्य सभा के नहीं रहे, क्या नीतीश कुमार ने कभी ऐसी कोई राजनैतिक महत्वकांक्षा अपने किसी साथी के सामने व्यक्त की थी? क्या नीतीश कुमार चारों सदनों से पेंशन लेना चाहते हैं? उन्हें पेंशन की दिक्कत हो गई?
अगर नीतीश ने ख़ुद ट्वीट किया है या उनके बदले किसी और ने किया है तब भी, यह सवाल बनता है कि नीतीश एक लाइन अपने स्वास्थ्य के बारे में भी लिख सकते थे कि वे इस वजह से पद छोड़ रहे हैं। वे चाहते हैं कि बिहार का नेतृत्व कोई स्वस्थ्य व्यक्ति करे। उस ट्वीट में यह भी नहीं था जबकि बात उनकी सेहत को लेकर ही हो रही है। क्या इसलिए कि उनके साथ सम्मान के साथ जो किया जा रहा है, उसमें अपमान भी झलकता रहे?
पूरे चुनाव में नीतीश ही मुख्यमंत्री थे, नीतीश ही मुख्यमंत्री हैं, नीतीश ही मुख्यमंत्री रहेंगे, यह नारा किस किस ने लगाया है। क्या वे एक योजना के तहत नारा लगा रहे थे या उन्हें वाकई यकीन था कि नीतीश ही मुख्यमंत्री रहेंगे? राजीव प्रताप रुडी, संजय कुमार झा और उपेंद्र कुशवाहा का बयान तो याद आता है कि उन्होंने ऐसा कहा था। क्या इन लोगों को नहीं बताना चाहिए कि बिहार में क्या हुआ? अगर नीतीश की सेहत सीएम बनने लायक नहीं है तो यह बात कह देने से क्या हो जाएगा।
रही बात बिहार में तख़्तापलट या भीतरघात की, नीतीश कुमार के समर्थक या वोटर इतने अनजान तो नहीं रहें होंगे कि उन्हें पता ही नहीं होगा कि चुनाव के बाद क्या होने वाला है? क्या नीतीश के कारण जो लोग विधायक बनते रहे हैं, वाकई उन्हें कभी नहीं लगा कि चुनाव के बाद नीतीश कुमार के साथ क्या होने वाला है? ये लोग धोखे में थे या धोखा नीतीश के साथ हुआ है?
नीतीश कुमार के साथ किसी को सहानुभूति हो या न हो लेकिन जिस राजनीतिक प्लान के तहत उनकी इतनी ख़राब विदाई हुई है, उस राजनीति को समझने का चश्मा कैसे उतारा जा सकता है। बिहार के लोग पोलिटिक्स में बहुत स्मार्ट होते हैं। कहने वाले क्या आज भी बिहार के बारे में वही कहेंगे? पोलिटिक्स में स्मार्ट तब कहे जाते जब इतनी बार से कोशिश कर रही बीजेपी को चुन लेते। बिहार ने कभी बीजेपी को नहीं चुना, दाद देनी चाहिए कि बीजेपी ने अपने समय से और हिसाब से बिहार को चुन लिया है। राजनीति में स्मार्टनेस बिहार से कब की विदा हो चुकी है। वो किसी और स्थान पर निवास करती है। क्या बिहार की जनता के साथ धोखा हुआ है? अगर इस सवाल का जवाब हाँ है, तो इसका समाधान आसान है। हर किसी के खाते में दस हज़ार भेज देना चाहिए। बिहार की बस इतनी सी राजनैतिक महत्वकांक्षा है। लोग खुशी के मारे नारे लगाने लगेंगे, बिहार में बहार है, बाहर नीतीश कुमार हैं।
~~ रविश कुमार

