हैदराबाद/तेलंगाना। देश में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही मुहिम के बीच तेलंगाना से एक बड़ी खबर सामने आई है। राज्य के मुख्यमंत्री A. Revanth Reddy की मौजूदगी में 130 माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इतने बड़े पैमाने पर हुआ यह सामूहिक सरेंडर सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक इन माओवादियों पर कुल मिलाकर लगभग 4.18 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था।
यह आत्मसमर्पण कार्यक्रम हैदराबाद में आयोजित किया गया, जहां राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में माओवादी कैडरों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। अधिकारियों का कहना है कि हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों की सख्ती, लगातार ऑपरेशन और सरकार की पुनर्वास नीति के कारण नक्सली संगठन कमजोर हो रहे हैं और उनके कैडर आत्मसमर्पण की ओर बढ़ रहे हैं।
अलग-अलग स्तर के नक्सलियों ने किया सरेंडर
सरेंडर करने वाले माओवादियों में संगठन के अलग-अलग स्तर के कैडर शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें शीर्ष स्तर के नेता से लेकर क्षेत्रीय और एरिया कमेटी के सदस्य तक शामिल हैं। जानकारी के मुताबिक आत्मसमर्पण करने वालों में 3 स्टेट कमेटी सदस्य, 1 रीजनल कमेटी सदस्य, लगभग 10 डिवीजनल कमेटी स्तर के कैडर, करीब 40 एरिया कमेटी सदस्य और लगभग 70 सामान्य पार्टी सदस्य शामिल हैं।
इन माओवादियों का संबंध मुख्य रूप से दंडकारण्य क्षेत्र से बताया जा रहा है, जो लंबे समय से माओवादी गतिविधियों का गढ़ माना जाता रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इनमें से कई नक्सली छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना की सीमा से लगे जंगल क्षेत्रों में सक्रिय थे और विभिन्न हिंसक घटनाओं में शामिल रहे हैं।
बस्तर क्षेत्र से भी जुड़े कई कैडर
बताया जा रहा है कि आत्मसमर्पण करने वाले कई माओवादी बस्तर क्षेत्र से भी जुड़े हुए थे। बस्तर का घना जंगल और दुर्गम इलाका लंबे समय से माओवादी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां से संचालित होने वाली Communist Party of India (Maoist) की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी को संगठन का एक महत्वपूर्ण ढांचा माना जाता है।
सूत्रों के मुताबिक आत्मसमर्पण करने वाले कई माओवादी इसी जोनल कमेटी और उससे जुड़े सैन्य संगठन पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) से संबंधित थे। इनका काम जंगल क्षेत्रों में गुरिल्ला गतिविधियां चलाना, सुरक्षा बलों पर हमले करना और स्थानीय स्तर पर संगठन का विस्तार करना था।
हथियार भी किए जमा
सरेंडर के दौरान माओवादियों ने कई आधुनिक और घातक हथियार भी सुरक्षा एजेंसियों के सामने जमा किए। अधिकारियों के मुताबिक इन हथियारों में AK-47 राइफल, INSAS राइफल, SLR राइफल, .303 राइफल, 9 एमएम कार्बाइन, पिस्टल और अन्य हथियार शामिल हैं।
सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इन हथियारों का इस्तेमाल कई हमलों में किया गया था। ऐसे में हथियारों का जमा होना भी सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक इससे माओवादी संगठन की सैन्य क्षमता पर भी असर पड़ेगा।
सुरक्षा बलों के दबाव का असर
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई का असर अब दिखाई देने लगा है। केंद्रीय सुरक्षा बलों और राज्य पुलिस ने संयुक्त रूप से कई बड़े ऑपरेशन चलाए हैं, जिनके चलते माओवादी संगठन के कई ठिकाने नष्ट किए गए हैं।
इसके अलावा कई शीर्ष माओवादी नेता मारे गए या गिरफ्तार किए गए हैं। इससे संगठन की कमान कमजोर हुई है और कई कैडर निराश होकर आत्मसमर्पण का रास्ता अपना रहे हैं।
पुनर्वास नीति का भी असर
तेलंगाना सरकार और अन्य राज्यों की सरकारों ने नक्सलियों के आत्मसमर्पण को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष पुनर्वास योजनाएं भी लागू की हैं। इन योजनाओं के तहत आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को आर्थिक सहायता, आवास, रोजगार प्रशिक्षण और समाज में पुनर्वास की सुविधा दी जाती है।
सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य उन लोगों को मुख्यधारा में वापस लाना है जो किसी कारण से नक्सली संगठन में शामिल हो गए थे। कई मामलों में देखा गया है कि संगठन छोड़ने के बाद पूर्व नक्सली सामान्य जीवन जीने लगे हैं।
मुख्यमंत्री ने कही यह बात
मुख्यमंत्री A. Revanth Reddy ने इस अवसर पर कहा कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि जो लोग अब भी जंगलों में रहकर हिंसक गतिविधियों में शामिल हैं, वे हथियार छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास जताएं और समाज के विकास में भागीदारी निभाएं।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आत्मसमर्पण करने वाले सभी लोगों को पुनर्वास योजना के तहत आवश्यक सहायता उपलब्ध कराएगी ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें।
नक्सलवाद के खिलाफ बड़ा संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि 130 माओवादियों का एक साथ आत्मसमर्पण नक्सल आंदोलन के लिए बड़ा झटका है। इससे संगठन के मनोबल पर असर पड़ सकता है और अन्य कैडरों को भी मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।
हालांकि सुरक्षा एजेंसियां यह भी मानती हैं कि नक्सलवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और जंगल क्षेत्रों में अभी भी कई सक्रिय समूह मौजूद हैं। ऐसे में सुरक्षा बलों की कार्रवाई और विकास कार्यों को लगातार जारी रखना जरूरी है।
फिलहाल तेलंगाना में हुए इस सामूहिक सरेंडर को सरकार और सुरक्षा एजेंसियां एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रही हैं। आने वाले समय में इसका असर पड़ोसी राज्यों खासकर छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में भी देखने को मिल सकता है, जहां नक्सलवाद लंबे समय से एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।


