जगदलपुर। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (Right to Education Act-2009) का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चों को समान और निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना है। लेकिन बस्तर जिले के जगदलपुर से सामने आया एक मामला इस कानून के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यहां एक निजी विद्यालय पर आरटीई के तहत अध्ययनरत छात्र के अभिभावक को कथित रूप से स्कूल बस लेने और 35 हजार वार्षिक ट्यूशन फीस जमा करने का दबाव बनाने तथा ऐसा नहीं करने पर छात्र को विद्यालय से निकालने की धमकी देने का आरोप लगा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, संतोषी वार्ड क्रमांक-27, जगदलपुर निवासी महेन्द्र नाग ने जिला शिक्षा अधिकारी (DEO), बस्तर को लिखित शिकायत सौंपकर बताया है कि उनका पुत्र एलेक्स नाग हम अकादमी, जगदलपुर में कक्षा 7वीं का छात्र है। छात्र का प्रवेश आरटीई 12(1)(सी) के तहत हुआ था और वह वर्तमान में इसी योजना के अंतर्गत अध्ययनरत है।
क्या है RTE 12(1)(C) योजना?
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 भारतीय संसद द्वारा 4 अगस्त 2009 को पारित किया गया था और 1 अप्रैल 2010 से पूरे देश में लागू हुआ। छत्तीसगढ़ में इस योजना का लाभ शैक्षणिक सत्र 2010-11 से दिया जा रहा है।
पहले इस अधिनियम का लाभ केवल कक्षा 8वीं तक ही मिलता था, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2019 में संशोधन कर इसकी मान्यता बढ़ाकर कक्षा 12वीं तक कर दी। इसके बाद आरटीई के तहत प्रवेश लेने वाले छात्र चयनित निजी विद्यालयों में नर्सरी/प्रथम कक्षा से लेकर 12वीं तक निःशुल्क शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
आरटीई की धारा 12(1)(सी) के तहत सभी गैर-अनुदान प्राप्त एवं गैर-अल्पसंख्यक निजी विद्यालयों में प्रारंभिक कक्षाओं की 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) एवं वंचित वर्ग (DG) के बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं। इस योजना का उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि समाज में सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) और समान अवसर सुनिश्चित करना है, ताकि आर्थिक और सामाजिक आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त किया जा सके।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में अब तक लगभग 2.9 लाख छात्र इस योजना का लाभ उठा रहे हैं।
बस नहीं ली तो बच्चे को स्कूल से निकाल देंगे
महेन्द्र नाग द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी को दी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विद्यालय प्रबंधन लगातार परिवार पर विद्यालय की बस सेवा लेने और 35,000 प्रतिवर्ष ट्यूशन फीस जमा करने का दबाव बना रहा है। शिकायत के अनुसार, प्रबंधन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि बस सुविधा नहीं ली गई और फीस जमा नहीं की गई तो छात्र को विद्यालय में नहीं रखा जाएगा तथा दूसरे विद्यालय में प्रवेश लेने के लिए कहा जाएगा।
अभिभावक का कहना है कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है और वे इतनी बड़ी राशि वहन करने में सक्षम नहीं हैं। उनका आरोप है कि आरटीई के तहत अध्ययनरत छात्र के साथ इस प्रकार का व्यवहार कानून की भावना और उसके मूल उद्देश्य के विपरीत है।
क्या ऐसे शुल्क की मांग वैध है?
आरटीई 12(1)(सी) के तहत प्रवेशित छात्रों को निर्धारित शर्तों के अनुसार निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है और सरकार स्कूलों को प्रतिपूर्ति भी करती है। ऐसे में यदि किसी आरटीई छात्र से अनुचित शुल्क वसूला जाता है, मानसिक दबाव बनाया जाता है या उसे विद्यालय से निकालने की धमकी दी जाती है, तो यह गंभीर जांच का विषय बन सकता है। यदि शिकायत सही पाई जाती है तो संबंधित विद्यालय के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
DEO से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग
अभिभावक ने जिला शिक्षा अधिकारी से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, विद्यालय प्रबंधन को नियमों का पालन करने के निर्देश देने तथा उनके पुत्र को बिना किसी दबाव के नियमित शिक्षा जारी रखने की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।
बस्तर में सामने आए इस मामले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि जब सरकार लाखों जरूरतमंद बच्चों को आरटीई के माध्यम से निजी विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने का दावा कर रही है, तब यदि आरटीई छात्रों पर फीस और अन्य सुविधाओं के नाम पर दबाव बनाया जाता है तो इस कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? अब सभी की नजर जिला शिक्षा अधिकारी की जांच और प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई है।
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