छत्तीसगढ़ मे सामने आया एक वीडियो अब सिर्फ वायरल क्लिप नहीं, बल्कि प्रशासनिक रवैये पर बड़ा सवाल बन चुका है। जिस मंच को “सुशासन” का प्रतीक बताया जा रहा था, वहीं एक जिम्मेदार अधिकारी खुलेआम जनता के प्रतिनिधि स्वर को धमकाते दिखाई दिए।
मामला दुर्ग जिले के थनौद गांव का है, जहां आयोजित ‘सुशासन तिहार’ कार्यक्रम में जनपद पंचायत सीईओ रूपेश पांडेय का आक्रामक व्यवहार कैमरे में कैद हो गया। वीडियो में सीईओ एक स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता और मंडल महामंत्री पुराण साहू पर इस कदर भड़कते नजर आते हैं कि खुले मंच से कह बैठते हैं…..“तेरे को जो करना है कर ले… मेरा क्या कर लोगे…”
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह पूरा घटनाक्रम क्षेत्रीय विधायक ललित चंद्राकर की मौजूदगी में हुआ। मंच पर विधायक खड़े रहे, लेकिन प्रशासनिक धमकी और सार्वजनिक अपमान के बीच उनकी चुप्पी भी अब सवालों के घेरे में है।
शिकायत लेकर पहुंचे कार्यकर्ता, मिला डराने वाला जवाब
जानकारी के मुताबिक भाजपा मंडल महामंत्री पुराण साहू गांव के सरकारी स्कूल की जमीन पर बनाए जा रहे सामुदायिक भवन के विरोध में आवेदन लेकर कार्यक्रम में पहुंचे थे। उनका आरोप है कि स्कूल की जमीन पर निर्माण नियमों के खिलाफ किया गया और शिकायतों के बावजूद काम बंद नहीं हुआ।
जब वे ‘सुशासन तिहार’ में आवेदन देने पहुंचे, तब कथित तौर पर सीईओ रूपेश पांडेय ने आवेदन लेने से ही इनकार कर दिया। इसके बाद बहस इतनी बढ़ी कि मामला खुले मंच पर धमकी तक पहुंच गया।
वीडियो में जिस तरह से उंगली दिखाकर भाषा का इस्तेमाल किया गया, उसने पूरे कार्यक्रम की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनता पूछ रही है….
क्या “सुशासन” का मतलब शिकायत सुनना है या शिकायत करने वालों को डराना?
स्कूल की जमीन पर निर्माण… और फिर स्टे के बावजूद पूरा हुआ भवन?
पूरा विवाद गांव के सरकारी स्कूल की जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि इसी जमीन पर सामुदायिक भवन का निर्माण किया गया। विरोध के बाद जनपद सीईओ ने खुद निर्माण पर रोक लगाने की बात कही थी, लेकिन इसके बावजूद अधूरा भवन धीरे-धीरे पूरा हो गया।
अब बड़ा सवाल यह है कि यदि निर्माण पर वास्तव में रोक लगी थी, तो फिर काम कैसे चलता रहा?
क्या प्रशासनिक आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित थे?
या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत से नियमों को ठेंगा दिखाया गया? पुराण साहू का आरोप है कि शिकायत वापस लेने और मामला दबाने के लिए उन पर लगातार दबाव बनाया गया।
“सुशासन” के मंच पर डर का माहौल?
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ खुलकर बोलने का साहस हर किसी में नहीं होता। लोगों में यह डर बना रहता है कि यदि उन्होंने शिकायत की, तो उनकी पहचान उजागर हो सकती है और बाद में उन्हें परेशान किया जा सकता है। यही वजह है कि कई लोग गलतियों और भ्रष्टाचार को देखकर भी सामने आने से बचते हैं। थनौद की घटना ने इसी डर को सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया है।
पहले भी विवादों में रह चुके हैं सीईओ
जनपद सीईओ रूपेश पांडेय का नाम इससे पहले भी विवादों में आ चुका है। पूर्व में उनके व्यवहार को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं। कुछ समय पहले दुर्ग जनपद की एक महिला सचिव ने भी उन पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए कलेक्टर से शिकायत की थी।
अब ताजा वायरल वीडियो ने उन आरोपों को फिर चर्चा में ला दिया है।
सबसे बड़ा सवाल — जनता आखिर जाए तो जाए कहाँ?
जब शिकायत सुनने के लिए लगाए गए सरकारी मंच पर ही शिकायतकर्ता को धमकी मिले…
जब जनप्रतिनिधि सामने खड़े रहकर भी मौन रहें…
जब सरकारी जमीन पर निर्माण के आरोपों पर सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए… तो फिर आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे?
सुशासन तिहार का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान बताना था, लेकिन थनौद की तस्वीर ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या व्यवस्था अब सवाल पूछने वालों को ही दुश्मन मानने लगी है?

